نخستین 200 خط.
ये फ़िल्म 1 जुलाई 2016 को बांग्लादेश, ढाका में होली आर्टिसन बेकरी
पर हुए हमले से प्रेरित है। इस फ़िल्म के सभी तत्त्व काल्पनिक हैं।
ना तो ये कोई डॉक्युमेंट्री है ना इसमें दिखाये गए
दृश्य उस काली रात को घटित घटना का चित्रण है।
फ़िल्म के कुछ पात्र, संस्थाएँ और घटनाएँ नाटकीय रूप से दर्शाए गए हैं।
इस फ़िल्म से जुड़ा कोई भी व्यक्ति किसी भी घटना की
ऐतिहासिक होने की पुष्ठी, समर्थन या खंडन नहीं करता।
इस फ़िल्म के निर्माता 1 जुलाई 2016 की काली रात को
शहीद होने वालों को श्रद्धांजलि देते हैं
और उन 22 नायकों का सम्मान करते हैं जिन्होंने एकसाथ व एक जैसी त्रासदी को झेला।
ढाका, बांग्लादेश
चलो लड़को! तैयार हो जाओ! चलो।
बिकास!
- मोबा तैयार हो जा। - हाँ?
मैं उठ रहा हूँ।
दिखाएगा।
पेज फाड़ दिया। दिखा।
- नहा ले। बास आ रही है। - मैं तैयार तो हूँ यार।
कौन सा तैयार है!
चल रोहन, तैयार हो जा।
जाने का टाइम हो गया।
यार, मुझे पंप करने दे।
एक दिन में रॉकी बनेगा क्या?
सेक्सी लग रहा है।
आजा।
जनाब।
जी।
जी, मैं…
फोटोज़ और विडियोज़ आपको मिल जाएँगे।
आप भी देख लीजिएगा, अगर पॉसिबल हो तो।
जी।
टीम एकदम सॉलिड है।
जी, जनाब। खुदाहाफ़िज़।
सब तैयार हैं एकदम।
तीस मिनट में निकल सकते हैं।
इतनी जल्दी क्या है?
एक गेम खेलकर निकलते हैं।
रहने दो ना।
और कितने गोल खाओगे।
साले, गलत ट्रेनिंग दे दी तुझे।
राजीव भाई…
आपको नहीं लगता कि हमें मैचिंग जर्सी,
- और ब्लैक टी-शर्ट पहननी चाहिए? - नहीं।
- नहीं मैं सोच रहा… - मत सोचो।
जाके बदलके आ।
- ये ही मिला था? - मैं इसको संभाल लूँगा।
चिंता मत करो।
रोज़ा खोलके निकलते हैं।
ठीक है।
मैंने तुमसे कहा था, लड़को।
एम्बेसी चलते हैं सुबह ही।
आप दोनों बिल्कुल गैरज़िम्मेदार हैं।
अरे मम्मा, पर हमें थोड़ी पता था कि ऐसा होगा?
आपकी वजह से आज हम मलेशिया में नहीं हैं।
घर के सब बड़े वहाँ ईद मनाएँगे और हम यहाँ हैं।
आपको पता है नानाभाई कितना नाराज़ हैं?
उसकी गलती नहीं थी कि एम्बेसी में स्याही खत्म हो गई।
हाँ, सही है। ये मेरी ही गलती है
कि मेरे बच्चे सुबह जल्दी नहीं उठे।
अगर सुबह पहुँच गए होते, तो शायद स्टैम्प लग भी गया होता।
पर नहीं हम एम्बेसी वीज़ा ऑफिस बंद होने से पाँच मिनट पहले पहुँचेंगे।
आपने अपने छोटू को समझाने की कोशिश की?
कितना इंपोर्टेंट है उनके लिए वहाँ जाकर अपना मास्टर्स करना?
- एक बार उसकी भी बात सुन लो, मम्मा। - स्टैनफोर्ड।
लोगों को एडमिशन नहीं मिलता है।
और वो लोग इनको सामने से बुला रहे हैं।
हाँ मम्मा, पर मैं तो कह रहा हूँ--
आप कम से कम इन्हें समझा तो सकते हो।
मुझे आपको एक ही बात
- कितनी बार बोलनी पड़ेगी? - इस तरीके से बात मत करो।
नहीं, ये सही नहीं है।
मैं कितनी बार ये बोल चुका हूँ
कि मुझे नहीं जाना है स्टैनफोर्ड।
मैं बांग्लादेश में रहना चाहता हूँ, यहाँ काम करना चाहता हूँ।
लेकिन नहीं, हमें वो ही करना है जो मम्मा चाहती हैं।
और मम्मा मुझे यहाँ से दूर भेजना चाहती हैं, है ना?
आप मुझे दूर क्यों भेजना चाहते हो?
फ़राज़!
मैं उससे बात करता हूँ।
लेकिन, नाज़नीन, हमें उनसे अभी तक कोई कोटेशन नहीं मिला।
हाँ, तुम अभी उन्हें मैसेज करो।
हाँ।
और डॉक्टर मुजाहिद को भी बताएँ, प्लीज़।
और फाइल कल नौ बजे तक मेरी टेबल पर होनी चाहिए।
हाँ। अब मैं मलेशिया नहीं जा रही हूँ तो हम शायद…
हाँ, बिल्कुल।
- तो तुम, डॉक्टर मुजाहिद, सब-- - मम्मा।
नाज़नीन, मैं तुम्हें वापस कॉल करती हूँ।
हाँ।
मम्मा, आई एम सॉरी।
स्टैनफोर्ड नहीं जाना है।
तो मत जाओ।
अगर तुम खुश नहीं, तो मैं कैसे खुश रह सकती हूँ?
और तुम प्लीज़ बेकार की बातें सोचना बंद करोगे, छोटू?
मैं तुम्हें यहाँ से दूर क्यों भेजना चाहूँगी?
मुझे बस तुम्हारे फ्यूचर की चिंता है,
और मैं तुम्हारे लिए सबसे अच्छा करना चाहती हूँ ना।
मुझे पता है।
लेकिन…
मेरे फ्यूचर का इतना स्ट्रेस मत लो।
कहाँ जा रहे हो?
होली आर्टिसन। बताया तो था।
छोटू।
मम्मा।
मैं जो भी करूँगा, आपको गर्व होगा मुझ पर, ओके?
अबे चिकन खत्म मत कर।
- मैं-- - पूरी प्लेट भरी हुई है तेरी।
मैं खजूर पैक करने वाला हूँ।
और लोगों को नहीं खाना?
अपना खत्म करता नहीं है।
यार, मैं ज़्यादा खाता हूँ यार।
- ज़्यादा खाता हूँ… - ओए! चिकन दे ना।
चिकन…
अबे यार ऐसे खत्म हो जाएगा।
तेरे पास है पहले से ही यार।
हर बार का नाटक है। हर बार का नाटक है।
तेरा प्लेट भरा हुआ है।
कम खा, यार।
है मेरे पास।
खैरूल थोड़े प्याज़ दे ना वहाँ से?
एक काम करो…
अनपैक करो, जाओ।
- क्या हुआ, राजीव भाई? - रहने देते हैं।
बाद में देख लेंगे।
जाओ।
- जाओ निकलो। - भाई, हम ट्रेनिंग ले
- रहे थे इतने-- - चुप।
रुक क्यों गए?
खाओ, खाओ! खाओ!
खाओ।
खाओ। खाओ।
उठाओ।
ये पकोड़े… ये… केले।
कम पड़ गए हो तो बिरयानी मँगवा दूँ? और मज़ा आएगा।
पेट भरके खाना।
ये बच्चों वाली हरकत अगर करनी है ना…
तो वापस जाओ अपने घर।
कोई ज़रूरत नहीं है तुम्हारी।
- मैं खुद कर लूँगा। - भाई ऐसे मत बोलिए।
- सॉरी, भाई। - सॉरी क्यों बोल रहा है?
सॉरी क्यों बोल रहा है?
प्रूव कर ना मुझे कि मैं गलत हूँ।
प्रूव कर!
प्रूव कर मुझे कि मैंने इन लोगों को चुनके,
अपने लिए गड्ढा नहीं खोदा है।
कर प्रूव!
तुम लोग प्रूव करके दिखाओ कि तुम्हारी जनरेशन बेकार नहीं है।
उसमें है वो जज़्बा…
जिसे देखकर दुनिया वाले बोलें
कि, "ये देखो इनको देखो, इनके जैसा बनना हैं।
ऐसा करना है।"
ये बचकानेपन की लड़ाईयाँ मत करो यहाँ पे।
मेरा संतरा, मेरे केले, मेरे कपड़े, ये वो, ये वो।
ये कैसा एटिट्यूड है, भेनचोद?
तुम लोगों को देखके ऐसा लगता है कि तुम्हारी खुद की यूनिटी इतनी कमज़ोर है,
कि उसके लिए दूसरों को क्या दोष देना?
सबके लिए लड़ने-मरने चले हैं, चूतिये साले!
- तुम लोगो से नहीं हो पाएगा। - अरे भाई…
- भाई… - राजीव भाई!
- राजीव भाई! - भाई…
- हो जाएगा। - करना है।
हो जाएगा।
अल्लाह हाफिज़।
होली आर्टिसन कैफे गुलशन, ढाका
भागो!
दरवाज़ा बंद करो!
अंदर चल, अंदर चल!
गोली नहीं मारूँगा, अंदर चल।
भागो।
वे सब…
मर चुके हैं।
चुप! चुप!
नीचे हो!
नीचे! नीचे!
चल।
चल।
शांत रहो, चुप हो जाओ।
बीच में आओ।
यहाँ आके बैठ जाइए।
चुपचाप यहाँ आके बैठ जाइए।
बांग्लादेशी मुस्लिम्स को कोई कुछ नहीं करेगा।
- खैरूल, ऊपर क्लियर कर। - चलो, नीचे चलो।
आपको सुनाई नहीं दिया?
घुटनों पर बैठो, सर नीचे करके।
बिकास, वहाँ पे देख।
आप आ जाइए, बीच में।
चलो।
क्लियर है बाहर?
क्लियर है।
सब क्लियर है।
- बैठ जाओ। - अम्मा…
इसकी आँखों पे पर्दा करो।
धन्यवाद।
तुम्हें बूम-बूम करना है?
बिकास, मेन दरवाज़ा।
सबके आईडी चेक करो।
जिसके पास भी आईडी नहीं है, सूरा पढ़वाओ।
आईडी?
जो भी बांग्लादेशी मुस्लिम नहीं है, उनको मार दो।
नाम क्या है तेरा?
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