Le prime 178 righe.
मेरे पूज्य पिताजी श्री लीलाराम राय सिंघानी को समर्पित
जन्म- 6 अगस्त 1931 मृत्यु - 11 जुलाई 2009
विशेष धन्यावाद
NETFLIX प्रस्तुत करता है
ज्वालापुर
रिशू।
रिशू।
रिशू!
रिशू!
रिशू!
नाम, ऋषभ सक्सेना।
उम्र, बत्तीस साल।
ब्लास्ट का समय, चार से साढ़े चार।
सब जल गया है।
सर पर भारी चोट है। लगता है ब्लास्ट के पहले किसी ने मारा है।
अरे, बाप रे!
-हम्म, देखो। पता लगाओ कब हुआ था। - हाँ, सर।
सर, फिंगरप्रिंट्स, एक हाथ के मिल गए हैं।
बाकी शरीर पूरी तरह से जला हुआ है।
-सर पर गहरी चोट है। -हाँ, सर।
पूरा शरीर जल गया है। सिर्फ़ यह हाथ मिला है।
सर पर भारी चोट का निशान है।
ऐसा लगता है मौत ब्लास्ट के पहले हुई।
हाथ में रानी लिखा है।
उसकी पत्नी है, वो वहाँ बैठी है।
यह दुर्घटना तो नहीं है, सर।
बस एक बार हथियार मिल जाए, सब पता चल जाएगा।
किशोर रावत
छह महीने पहले
- -मुँह सूजाना बंद करो।
शगुन के काम से जा रहे हैं!
दो साल पहले भी गए थे।
याद है?
-वही तो। - टिकट दिखाइए।
दो साल हो गए हैं!
दो मिनट की मुलाकात में तुम मीरा को आज तक नहीं भूले।
और बताइए, क्या अच्छा लगता है आपको?
महेश।
मुझे महेश बहुत पसंद है।
असल में, हम ना कॉलेज में साथ में पढ़े हुए हैं।
बस अभी तक पापा को बताने की हिम्मत नहीं हुई।
पहली बार लड़की देखने गए, कोई प्यार में पड़ता है क्या?
तब से देवदास ही बन गए हो।
और यहाँ इतने अच्छे रिश्ते आ रहे हैं।
जन्मपत्री मिल गई, गुण मिल गए।
नाम भी कितना प्यारा है।
रानी कश्यप।
रिशू-रानी, नाम का तो तुम्हारा अच्छा जोड़ा बैठ गया है।
पता है, लड़की सुंदर है, सुशील है,
शाकाहारी है, गोरी भी है।
हिंदी साहित्य में एम. ए. किया है लड़की ने।
अरे, अब बस करो, मम्मी। अंदर जाके मिल लेंगे हम।
और बाथरूम जाने के बहाने पूरे घर का मुआयना मत कर आना आप, पिछली बार की तरह।
आइए।
खाइए ना। ये सारे पकवान रानी ने अपने हाथों से बनाए हैं।
- सारे? - जी, सारे।
-ये कचौरी भी रानी ने बनाई है? - हाँ जी।
वो आपके पीछे जो कशीदाकारी है सोफ़े पर वो भी हमारी रानी ने ही की है।
पसंद है?
इंजीनियर है, ज्वालापुर इलेक्ट्रसिटी बोर्ड में।
देखेंगे।
अब ज्वालापुर कौन जाएगा।
ये सब मत सोच।
तेरा वो पाँच साल वाला बॉयफ्रेंड, क्या था वो, पंखे वाला नाम था न उसका…
वो…
नीरज खेतान। वो तो हवा देके निकल गया अमरीका।
और तेरा वो दो साल वाला बॉयफ्रेंड…
मासी… मेरे बॉयफ्रेंड थे न। पता है मुझे। याद है।
तो अब बस ये रंगीन किताबी रोमांस नहीं,
सीधा सा लड़का पकड़ ले।
तेरी उम्र भी तो हो गई है।
और ऊपर से इतनी भारी मांगलिक वाली कुंडली है न तेरी,
कि भाईसाहब दो साल में सिर्फ़ दो रिश्ते ढूंढ पाए।
और देख, देख तेरा दूसरा ऑप्शन।
-ये मुंबई वाला। -
इससे मैच हुई है तेरी कुंडली।
और ये… ज्वालापुर।
ज्वालापुर?
हाँ, तो?
भाईसाहब भी इनकी तरह कम ही बोलते हैं।
रानी ने रिशू को अंदर बुलाया है, किचन में।
आइए।
अब ये मत पूछ लेना और क्या अच्छा लगता है।
आइए ना।
-हेलो। -हेलो।
तो, मैं सोच रही हूँ संक्षेप में मैं ही बता देती हूँ।
मैंने साहित्य पढ़ रखा है।
टाइम पास के लिए एक सैलून में मैनेजर का काम करती हूँ।
और घर का काम करना न, मुझे बिलकुल पसंद नहीं है।
- -बाकी, सुशील तो मैं हूँ ही
और घरेलू भी हूँ।
वैसे न आपको बहुत अच्छा कॉम्बो मिल रहा है, तन-मन का धन।
हमारी तो बस दो माँगें हैं। एक लड़की घरेलू हो और सीधी हो।
फिर तो राम-सीता सी जोड़ी है।
अह, आपने दिनेश पंडित की कोई किताब पढ़ी है?
सबसे बेहतरीन क्राइम उपन्यासकार हैं!
क्या लिखते हैं! छोटे-छोटे शहरों में ना बड़े-बड़े कत्ल करा देते हैं,
पता ही नहीं चलता।
सुना है आपने उनके बारे में?
जी, नहीं।
अभी सुन रहा हूँ, आपसे।
- -आप, आज ही मुझसे बात करेंगे
कि फिर कभी आएंगे दिल्ली बात करने?
नहीं, वो, दरअसल…
अच्छा छोड़िए, आप बताइए, आपके क्या शौक हैं।
-शौक क्या ही हैं कि… -क्या हैं?
जी, मैं बता रहा हूँ।
जी…
छुट्टी के दिन बस पड़ोसी घेर लेते हैं,
कहते हैं, कभी फ्रिज ठीक करके दे दो तो कभी पंखा।
इलेक्ट्रॉनिक्स का शौक है। इंजीनियर हूँ, बताया होगा आपको।
अरे वाह। ये तो बड़ी सही टाइमिंग हो गई!
-शुक्रिया। -लगे हाथ हॉबी टेस्ट कर लेते हैं।
ये ख़राब पड़ा है कितने टाइम से।
ये ठीक कर दो।
अभी?
इसमें से क्या चाहिए?
बीना जी, टॉयलेट कहाँ है?
आइए।
सीधा जाइए और बाएं।
नहीं, नहीं…
टॉयलेट ढूंढ रही थी।
हमारे गुरूजी से पूछकर मैं आपको बताती हूँ।
हाँ?
सुनो, कह रहे हैं।
अगर तुमने इस लड़की से शादी की ज़िद नहीं छोड़ी तो मैं यह फ़िनाइल पी लूँगी।
मम्मी, हमको रानी कश्यप पसंद है।
ठीक है।
फिर मैं, यहाँ से लटक जाती हूँ। हमारी अस्थियाँ बहा देना।
और ले आना अपनी प्यारी रानी को।
मैं कूद जाऊँगी यहाँ से।
अरे?
हिल भी नहीं रहे!
कन्फ्यूज़ कर दिया। कभी ज़हर,
कभी बन्नी, कभी लटकना।
तय करके बोलो न, प्लीज़।
- -बोल रहे हैं। नहीं पटेगी तुम्हारी।
नहीं संभलेगी तुमसे।
मम्मी, इंजीनियर हैं हम।
रोज़ सौ-सौ वॉल्ट के बिजली के तारों को संभालते हैं इन हाथों से।
वो नहीं संभलेगी क्या हमसे?
- एक बात बताएं, अंकल। - हाँ?
-ट्रेनिंग लगती है। -अच्छा?
शुरू के दस दिन में ट्रेन हो जाएंगी भाभी। और ये तो बबली सी है।
बेटा, शुरू-शुरू में सभी बबली लगती हैं।
- मुझे भी ऐसी ही लगी थी, जब आई थी। -
-मुझे भी आप बबल लगे थे पूरा, फट गया! -
टोटा मिल गया उस औसत इंसान को!
उसकी शामत आने वाली है ज्वालापुर में!
रिशू संग रानी
रानी जी।
साहब… साहब आ रहे हैं, बस पाँच मिनट।
सर, टिफ़िन गिर गया।
रिशू भैया का केस मेरा सबसे मनपसंद केस है, भैया।
क्यों, रस्तोगी जी?
अरे, दंगे-डकैत से ऊब कर,
अब आराम से बैठकर इस केस की चर्चा में बहुत सारे समोसे-कचौरी पचाने हैं हमें।
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