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Haseen Dillruba (2021) Hindi (1080p WEBRip x265 10bit AC3) - [Musafirboy]
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Pubblicato il: 2023-10-24
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Le prime 178 righe.

‎मेरे पूज्य पिताजी ‎श्री लीलाराम राय सिंघानी को समर्पित

‎जन्म- 6 अगस्त 1931 ‎मृत्यु - 11 जुलाई 2009

‎विशेष धन्यावाद

‎NETFLIX प्रस्तुत करता है

‎ज्वालापुर

‎ रिशू।

‎रिशू।

‎रिशू!

‎रिशू!

‎ रिशू!

‎ नाम, ऋषभ सक्सेना।

‎उम्र, बत्तीस साल।

‎ब्लास्ट का समय, चार से साढ़े चार।

‎ सब जल गया है।

‎ सर पर भारी चोट है। ‎लगता है ब्लास्ट के पहले किसी ने मारा है।

‎अरे, बाप रे!

‎-हम्म, देखो। पता लगाओ कब हुआ था। ‎- हाँ, सर।

‎सर, फिंगरप्रिंट्स, एक हाथ के मिल गए हैं।

‎बाकी शरीर पूरी तरह से जला हुआ है।

‎-सर पर गहरी चोट है। ‎-हाँ, सर।

‎पूरा शरीर जल गया है। ‎सिर्फ़ यह हाथ मिला है।

‎सर पर भारी चोट का निशान है।

‎ऐसा लगता है मौत ब्लास्ट के पहले हुई।

‎हाथ में रानी लिखा है।

‎उसकी पत्नी है, वो वहाँ बैठी है।

‎यह दुर्घटना तो नहीं है, सर।

‎बस एक बार हथियार मिल जाए, सब पता चल जाएगा।

‎किशोर रावत

‎छह महीने पहले

‎- ‎-मुँह सूजाना बंद करो।

‎शगुन के काम से जा रहे हैं!

‎दो साल पहले भी गए थे।

‎याद है?

‎-वही तो। ‎- टिकट दिखाइए।

‎दो साल हो गए हैं!

‎दो मिनट की मुलाकात में ‎तुम मीरा को आज तक नहीं भूले।

‎और बताइए, क्या अच्छा लगता है आपको?

‎महेश।

‎मुझे महेश बहुत पसंद है।

‎असल में, हम ना कॉलेज में ‎साथ में पढ़े हुए हैं।

‎ बस अभी तक पापा को बताने की ‎हिम्मत नहीं हुई।

‎ पहली बार लड़की देखने गए, ‎कोई प्यार में पड़ता है क्या?

‎तब से देवदास ही बन गए हो।

‎और यहाँ इतने अच्छे रिश्ते आ रहे हैं।

‎जन्मपत्री मिल गई, गुण मिल गए।

‎नाम भी कितना प्यारा है।

‎रानी कश्यप।

‎रिशू-रानी, नाम का तो तुम्हारा ‎अच्छा जोड़ा बैठ गया है।

‎पता है, लड़की सुंदर है, सुशील है,

‎शाकाहारी है, गोरी भी है।

‎ हिंदी साहित्य में ‎एम. ए. किया है लड़की ने।

‎अरे, अब बस करो, मम्मी। ‎अंदर जाके मिल लेंगे हम।

‎और बाथरूम जाने के बहाने पूरे घर का ‎मुआयना मत कर आना आप, पिछली बार की तरह।

‎ आइए।

‎ खाइए ना। ये सारे पकवान ‎रानी ने अपने हाथों से बनाए हैं।

‎- सारे? ‎- जी, सारे।

‎-ये कचौरी भी रानी ने बनाई है? ‎- हाँ जी।

‎वो आपके पीछे जो कशीदाकारी है सोफ़े पर ‎वो भी हमारी रानी ने ही की है।

‎ पसंद है?

‎इंजीनियर है, ‎ज्वालापुर इलेक्ट्रसिटी बोर्ड में।

‎देखेंगे।

‎अब ज्वालापुर कौन जाएगा।

‎ ये सब मत सोच।

‎तेरा वो पाँच साल वाला बॉयफ्रेंड, ‎क्या था वो, पंखे वाला नाम था न उसका…

‎वो…

‎नीरज खेतान। ‎वो तो हवा देके निकल गया अमरीका।

‎और तेरा वो दो साल वाला बॉयफ्रेंड…

‎मासी… मेरे बॉयफ्रेंड थे न। ‎पता है मुझे। याद है।

‎ तो अब बस ये ‎रंगीन किताबी रोमांस नहीं,

‎सीधा सा लड़का पकड़ ले।

‎तेरी उम्र भी तो हो गई है।

‎और ऊपर से इतनी भारी ‎मांगलिक वाली कुंडली है न तेरी,

‎कि भाईसाहब दो साल में ‎सिर्फ़ दो रिश्ते ढूंढ पाए।

‎और देख, देख तेरा दूसरा ऑप्शन।

‎-ये मुंबई वाला। ‎-

‎इससे मैच हुई है तेरी कुंडली।

‎और ये… ज्वालापुर।

‎ज्वालापुर?

‎हाँ, तो?

‎भाईसाहब भी इनकी तरह कम ही बोलते हैं।

‎रानी ने रिशू को अंदर बुलाया है, किचन में।

‎आइए।

‎अब ये मत पूछ लेना और क्या अच्छा लगता है।

‎आइए ना।

‎-हेलो। ‎-हेलो।

‎तो, मैं सोच रही हूँ ‎संक्षेप में मैं ही बता देती हूँ।

‎मैंने साहित्य पढ़ रखा है।

‎टाइम पास के लिए एक सैलून में ‎मैनेजर का काम करती हूँ।

‎और घर का काम करना न, ‎मुझे बिलकुल पसंद नहीं है।

‎- ‎-बाकी, सुशील तो मैं हूँ ही

‎और घरेलू भी हूँ।

‎वैसे न आपको बहुत अच्छा कॉम्बो मिल रहा है, ‎तन-मन का धन।

‎हमारी तो बस दो माँगें हैं। ‎एक लड़की घरेलू हो और सीधी हो।

‎फिर तो राम-सीता सी जोड़ी है।

‎अह, आपने दिनेश पंडित की कोई किताब पढ़ी है?

‎सबसे बेहतरीन क्राइम उपन्यासकार हैं!

‎क्या लिखते हैं! छोटे-छोटे शहरों में ना ‎बड़े-बड़े कत्ल करा देते हैं,

‎पता ही नहीं चलता।

‎सुना है आपने उनके बारे में?

‎जी, नहीं।

‎अभी सुन रहा हूँ, आपसे।

‎- ‎-आप, आज ही मुझसे बात करेंगे

‎कि फिर कभी आएंगे दिल्ली बात करने?

‎नहीं, वो, दरअसल…

‎ अच्छा छोड़िए, ‎आप बताइए, आपके क्या शौक हैं।

‎-शौक क्या ही हैं कि… ‎-क्या हैं?

‎ जी, मैं बता रहा हूँ।

‎जी…

‎छुट्टी के दिन बस पड़ोसी घेर लेते हैं,

‎कहते हैं, कभी फ्रिज ठीक करके दे दो ‎तो कभी पंखा।

‎इलेक्ट्रॉनिक्स का शौक है। ‎इंजीनियर हूँ, बताया होगा आपको।

‎अरे वाह। ये तो बड़ी सही टाइमिंग हो गई!

‎-शुक्रिया। ‎-लगे हाथ हॉबी टेस्ट कर लेते हैं।

‎ये ख़राब पड़ा है कितने टाइम से।

‎ये ठीक कर दो।

‎अभी?

‎इसमें से क्या चाहिए?

‎बीना जी, टॉयलेट कहाँ है?

‎आइए।

‎सीधा जाइए और बाएं।

‎नहीं, नहीं…

‎टॉयलेट ढूंढ रही थी।

‎हमारे गुरूजी से पूछकर मैं आपको बताती हूँ।

‎हाँ?

‎सुनो, कह रहे हैं।

‎अगर तुमने इस लड़की से शादी की ज़िद ‎नहीं छोड़ी तो मैं यह फ़िनाइल पी लूँगी।

‎मम्मी, हमको रानी कश्यप पसंद है।

‎ठीक है।

‎फिर मैं, यहाँ से लटक जाती हूँ। ‎हमारी अस्थियाँ बहा देना।

‎और ले आना अपनी प्यारी रानी को।

‎मैं कूद जाऊँगी यहाँ से।

‎अरे?

‎हिल भी नहीं रहे!

‎कन्फ्यूज़ कर दिया। कभी ज़हर,

‎कभी बन्नी, कभी लटकना।

‎तय करके बोलो न, प्लीज़।

‎- ‎-बोल रहे हैं। नहीं पटेगी तुम्हारी।

‎नहीं संभलेगी तुमसे।

‎मम्मी, इंजीनियर हैं हम।

‎ रोज़ सौ-सौ वॉल्ट के बिजली के ‎तारों को संभालते हैं इन हाथों से।

‎वो नहीं संभलेगी क्या हमसे?

‎- एक बात बताएं, अंकल। ‎- हाँ?

‎-ट्रेनिंग लगती है। ‎-अच्छा?

‎शुरू के दस दिन में ट्रेन हो जाएंगी भाभी। ‎और ये तो बबली सी है।

‎ ‎बेटा, शुरू-शुरू में सभी बबली लगती हैं।

‎- मुझे भी ऐसी ही लगी थी, जब आई थी। ‎-

‎-मुझे भी आप बबल लगे थे पूरा, फट गया! ‎-

‎टोटा मिल गया उस औसत इंसान को!

‎उसकी शामत आने वाली है ज्वालापुर में!

‎रिशू संग रानी

‎ रानी जी।

‎साहब… साहब आ रहे हैं, बस पाँच मिनट।

‎ सर, टिफ़िन गिर गया।

‎रिशू भैया का केस ‎ मेरा सबसे मनपसंद केस है, भैया।

‎क्यों, रस्तोगी जी?

‎अरे, दंगे-डकैत से ऊब कर,

‎अब आराम से बैठकर इस केस की चर्चा में ‎बहुत सारे समोसे-कचौरी पचाने हैं हमें।

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