لومړۍ 200 کرښې.
यह फ़िल्म काल्पनिक है।
सब कल्पना पर आधारित है।
फ़िल्म हिंसा को बर्दाश्त नहीं करती। दर्शक सावधानी बरतें।
अम्मू।
तुम सच में हमारे पड़ोसी, रवि अंकल से शादी करोगी?
हाँ! क्यों?
वह सच में अच्छे लगते हैं?
शायद लगते हैं।
क्यों अच्छे लगते हैं?
पता नहीं।
तो फिर उनसे शादी क्यों कर रही हो?
क्यों पूछ रही हो?
तुम उससे शादी करना चाहती हो?
मैं? छी!
छी?
वह बड़े डरावने हैं! हे भगवान!
किस बात का डर है? तुम्हारे साथ कुछ किया क्या?
नहीं, कुछ नहीं किया।
पर बड़े डरावने हैं!
इतने लंबे-चौड़े हैं।
हम जब भी उनकी मोटरसाइकिल के पास खेलते हैं,
वह हमें घूरते रहते हैं।
और सब डरकर भाग जाते हैं।
तुम्हें डर नहीं लगता, अम्मू?
तुम खुद शैतान हो!
हर कोई तुमसे डरता है।
किस बात का डर है?
-अम्मू... -नहीं, अम्मू।
तुम क्या कर रही हो?
तुमने साड़ी खराब कर ली!
बच्ची हो क्या?
-वही तो है। -सब इंतज़ार कर रहे हैं।
और तुम खेल रही हो।
-चलो। -माँ!
क्या?
सब ठीक है न?
सब एकदम ठीक है!
चलो।
यहाँ आकर बैठो। शर्माओ नहीं।
आराम से बैठो।
क्या, अम्मू?
हम तुम्हें पहली बार देख रहे हैं क्या?
आराम से बैठो!
उस दिन मैंने इसे पानी की टंकी वाले से झगड़ते देखा।
बड़ी हिम्मतवाली लगी।
अब, इतनी मासूम लग रही है।
यह वही लड़की है क्या?
कोई शक नहीं। यही है।
तुम्हें परख रहे हैं।
वे दिन गए!
अब यह आपकी बहू होगी।
आज्ञाकारी होना अच्छा है।
इतने सालों से हम पड़ोसी थे।
इन दोनों को प्यार हो जाता तो कोई मुश्किल न होती!
-हाँ। -यही हमारी परवरिश है!
सच कहा।
बच्चे हमारी इज़्ज़त रखते हैं।
अम्मू, वह तुम्हें देख रहे हैं।
जानती हूँ।
अम्मू! आकर रवि के बगल में खड़ी हो जाओ।
देखें, एकसाथ कैसे लगते हो।
-जाओ, रवि। -पिताजी।
-चलो, जाओ। -जाओ।
अरे! क्या हुआ?
ए! हँस क्यों रही हो?
अम्मू?
तुम्हें कब तक थाने पहुँचना है?
सुबह के 7:00 बजे तक।
पहले दिन देर नहीं कर सकता।
नाश्ता करके जाओ।
ठीक है।
और दोपहर का खाना? घर आओगे क्या?
मैं नहीं आ सकता।
शुरुआती दिनों में तो नहीं।
बंदोबस्त हो जाएगा। आस-पास कोई होटल होगा।
अच्छा... अकेले मुश्किल तो नहीं होगी?
नहीं! क्यों याद दिला रहे हो?
मुझे पहले से डर लग रहा है!
मैं आज तक कभी अकेली नहीं रही।
क्यों डर लग रहा है?
इंस्पेक्टर की बीवी के साथ कौन पंगा लेगा?
और अगर लिया तो इंस्पेक्टर क्या करेगा?
कसम से। उसे चीर डालूँगा।
मेरा पति सूरमा है!
अगर तीन दिखाई देने वाले शेरों का मतलब न्याय, नैतिकता और ईमानदारी है,
तो न दिखने वाला यह पुलिसवाला है।
वाह! कमाल है!
तुम्हें क्या चाहिए?
-बोलने के लिए? -नहीं।
अब जब हमारी शादी हो गई है, तो तुम्हें कुछ देना है।
बताओ। तुम्हें क्या चाहिए?
एक हफ़्ते तक सोचो।
माफ़ करना! याद आ गया।
मैंने अपनी सिलाई मशीन माँ को दे दी।
मुझे बिल्कुल नई सिलाई मशीन चाहिए।
मुझे लगा खिलौना, चॉकलेट या साड़ी माँगोगी।
यह तो महंगी लगती है।
पक्का?
मैं क्या कोई बच्ची हूँ जो खिलौने और छोटी-मोटी चीज़ें माँगूँ?
हाँ।
-नहीं हो? -बिल्कुल नहीं!
पर सिलाई मशीन क्यों?
कुछ पैसे कमाने के लिए।
बिल्कुल नहीं!
जो आदमी पत्नी से कमाई करवाए, वह आदमी नहीं!
क्यों? मेरे काम करने से तुम्हें परेशानी है?
मुझे आराम करने में मुश्किल नहीं!
तुम्हारे माँ-बाप से वादा किया था कि तुम्हारा खयाल रखूँगा।
एक अच्छे पति के नाते अपनी पत्नी की इच्छाओं को पूरा करना चाहिए।
सब इच्छाएँ पूरी करना चाहते हो?
-हाँ? -हाँ।
ए!
कॉफ़ी।
क्या हुआ?
-एक और लाऊँ? -नहीं।
-अरे, वाह। -अच्छा लगा?
अच्छा लगा।
नहाते समय मुझे यह मिला।
तुम्हारा है क्या?
यह मेरा नहीं है।
तुम्हारा नहीं है?
-और तुमने क्या किया? -बताया न।
यह लिनी है, हमारी पड़ोसी।
-पढ़ाती है। -हैलो।
हमारे नए सीआई, रविंद्रनाथ।
के. सुरेंदर रेड्डी
मेरी माँ से क्या बात हुई?
ऊब गए हैं और पूछ रहे थे कि हम बच्चा कब कर रहे हैं।
वे ऊब गए हैं, और तुम?
और तुम?
मैंने किसी को खाना लाते नहीं देखा।
आपकी पत्नी आपको बहुत पूजती हैं, सर।
बाप रे!
मैडम, आपके पति ने तोहफ़ा भेजा है।
निशा वंडर स्टिच
-तुमसे प्यार है! -क्या?
तुमसे प्यार है।
-अचानक से मुआइना? -हाँ, सर।
डीआईजी साहब अचानक से मुआइना कर रहे थे।
सीआई किसी काम से थाने के बाहर गए थे, बस।
हथियारों वाला कमरा खुला था, एफ़आईआर के रिकार्ड बिखरे हुए थे,
और आने वाले कुछ लोगों की दाढ़ी थी।
उन्होंने खुद सीआई के निलंबन पत्र पकड़ाने तक का इंतज़ार किया।
कुल मिलाकर, एक सीआई, दो एसआई और दो कॉनस्टेबल को
बिना सोचे-समझे वापस भेज दिया गया।
-कौन सा थाना था, सर? -चुप रह।
मेरी बेटी की हालत देखिए!
-सर। -सर।
-बैठ। -क्या मामला है?
उत्पीड़न का मामला है। शिकायत दर्ज कर रहे हैं।
बैठ जाइए। तुम संभाल लो।
-इकबाल, सर। -सर।
देखिए, उन आदमियों ने मेरी बेटी के साथ क्या किया।
अगर आपको अपनी बेटी का कुछ अता-पता होता,
तो आप यहाँ न होतीं।
अब रोने से क्या फ़ायदा?
मैं और क्या करूँ?
मैं दिन भर काम करती हूँ और रात को घर जाती हूँ।
उसका बाप एकदम निकम्मा है।
मैं क्या कर सकती हूँ?
पुलिस भी एक हद तक ही कर सकती है।
सिर्फ़ दस पुलिसवाले हैं।
हम हर जगह चौकसी नहीं कर सकते। आपकी बेटी है। आपको खयाल रखना चाहिए।
-मनसूर! -सर!
ये लोग मदद के लिए यहाँ आए हैं।
हमारे अलावा कौन मदद करेगा?
मैं तो बस...
हमारा काम इनकी हिफ़ाज़त करना है।
सिर्फ़ इनकी नहीं, बल्कि सभी औरतों की।
मेरा वह इरादा नहीं...
रोइए मत, मैडम।
मैं उन्हें पकड़कर रहूँगा।
और ध्यान रखूँगा
कि किसी और के साथ ऐसा न हो।
बड़ी मेहरबानी होगी।
देखिए...
आपको शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं।
अपराधियों को शर्मिंदा होना चाहिए।
आपको नहीं।
अच्छा है।
इसे घर ले जाइए।
शुक्रिया, सर।
-माफ़ कीजिए, सर। -ठीक है।
-इकबाल जी। -सर।
लोगों से मदद पाने के लिए, स्वयंसेवा कार्यक्रम का एलान कीजिए।
स्वयंसेवकों को खोजिए।
चौकसी करने को कहिए।
अगर उन्हें किसी चीज़ पर शक हो, तो उनसे कहिए कि हमें खबर दें।
-ठीक है, सर। -और नज़र रखने वाले चाहिए।
कर्नाटक के "सुरक्षा मित्र" जैसा कोई कार्यक्रम है?
-हाँ। -अच्छा।
सामुदायिक निगरानी से सुरक्षा में सुधार आएगा।
-जी, सर। -हमें पूरी खबर होगी।
सभी को इसकी खबर होनी चाहिए।
हमें इस इलाके की हर सड़क से एक स्वयंसेवक चाहिए।
विचार बहुत अच्छा है।
पर इसे लागू करने के लिए हमें डीआईजी साहब की मंज़ूरी चाहिए।
डीआईजी साहब से बात करूँगा।
-ठीक है। -वह एलान करें, यही ठीक होगा।
-अच्छा? -जी, सर।
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