لومړۍ 200 کرښې.
इस कहानी के सभी पात्र, नाम और घटनाएं काल्पनिक है।
यह फिल्म केवल मनोरंजन के लिए बनाई गई है।
फिल्म के निर्माण के दौरान पशुओं को हानि नहीं पहुँचाई है।
इस फिल्म के अभिनेता धूम्रपान या मद्यसेवन का समर्थन नहीं करते।
गौरी देशपांडे की कहानी "पाऊस आला मोठा" पर आधारित।
रुको।
सावित्री सरदेसाई...
एक मिनट।
हेलो?
हेलो, मैडम...
आपके यहाँ कोई आया है।
कौन आया है? फ़ोन दो उन्हें।
बात करो।
हेलो, सावि दीदी...
मैं जॉन।
-जॉन, तुम आ गए? -हाँ।
आपका सामान लेकर आया हूँ।
-चौथी मंज़िल पर आ जाओ। -ठीक है।
ज़रा चौकीदार को फ़ोन दो।
जी, मैडम।
हाँ, भेज दो उसे ऊपर।
ठीक है, मैडम।
-फ्लैट क्रमांक 402, चौथी मंज़िल। -ठीक है।
चलो।
आओ, इसे अंदर के कमरे में रख दो।
यहाँ, अंदर। इस तरफ़।
बैठो ना।
आखिरकार, तुमने जाने का फ़ैसला कर लिया।
हाँ।
अब कोल्हापूर में रहने का मन नहीं करता।
आप वहाँ नहीं है और कोई भी नहीं है।
मैं बेटी की शादी करने का निर्णय लिया है, सावि दीदी।
अच्छा।
पर तुम्हारे घर का मरम्मत हुआ क्या?
अगर आपने पैसे नहीं दिए होते, तो मुमकिन नहीं था।
और किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो, तो बेझिझक बताना।
जी, बिल्कुल। यह आपके कोल्हापूर के घर की चाबियाँ।
तो क्या मैं जाऊँ?
गाड़ी वाले को भी जाना है।
ठीक है।
बेटी की शादी तय हो जाएगी, तो आपको खबर कर दूँगा।
आप आएँगी तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा।
मैं ज़रूर आऊँगी।
मैं अब चलता हूँ।
यह कहानी मेरी और अम्मी की है।
अब, यह अम्मी कौन है?
धीरे, धीरे आप सब जान जाएँगे।
तो, यह हम दोनों की कहानी है,
पर कहानी मैं सुना रही हूँ,
इसलिए आप मेरे बारे में ही पहले जानेंगे।
मैं सावित्री जगदीश सरदेसाई।
सुप्रभात, दोस्तों।
कहते हैं कि भगवान हर जगह उपस्थित नहीं हो सकते,
इसलिए उन्होंने माँ बनाई।
वह हमारे लिए बहुत कुछ करती हैं।
दिन-रात काम करती हैं।
वह हमारा ख़्याल रखती हैं।
वह हमेंं अच्छी आदतें सिखाती हैं।
वह हमेंं अच्छे-बूरे का फर्क़ सिखाती है।
वह हमपर प्यार बरसाती है,
और समय आने पर सख़्त भी होती है।
हमारी पसंद-नापसंद का ख्याल रखती है।
-हमें देखते ही, उसे... -कितनी उबाऊ लड़की है!
अब मुझे भी रोना पड़ेगा।
क्या आपको याद है चोट लगने पर,
आपने कभी पिताजी को पुकारा हो?
नहीं, हम हमेशा माँ को ही पुकारते हैं।
मुझे लगता है, दर्द और माँ का
ज़रूर कोई रिश्ता है।
वह निःस्वार्थ भाव से हमेंं सब कुछ देती है,
और बदले में कुछ नहीं चाहती।
जब वह काम में कितनी भी व्यस्त हो,
तब भी वह हमारे बारे में सोचती रहती है।
हमेंं अपने आप को भाग्यवान समझना चाहिए
के हमारे पास हमारी माँ है।
-गायत्री... -वह हमेशा हमारा साथ देती है।
सावि भी रो रही है।
सावि, गायत्री, क्या हुआ?
मैडम, इन दोनों की माँ नहीं है।
ओह!
कृपया, रोओ मत, ठीक है?
-शांत हो जाओ। -तीनों लोकों का स्वामी अपनी
-माँ के बिना भिखारी है। -गीता,
-इन्हें बाहर ले जाओ। -हाँ, मैडम।
चलो।
इसलिए दोस्तों, माँ का सम्मान करो,
और उसे ढेर सारा प्यार करो। शुक्रिया।
हटो।
हाँ। चलो।
सावि, लो।
आज करुणा ने अच्छा भाषण दिया, है ना?
मुझे लगता है कि उसके पिताजी ने उसकी मदद की होगी।
वैसे तो उसे निबंध की चार पंक्तियाँ भी खुद नहीं लिख सकती,
पर उसका भाषण हृदयस्पर्शी था, ना?
सुनते समय, मुझे भी माँ की बहुत याद आई।
मैं घर पहुँचकर उसके गाल पर चुंबन दूँगी।
सिर्फ़ हु-हु क्यों कर रही हो?
माफ़ करना,
तुम्हें बूरा लगा क्या?
माँ की याद आ रही है क्या?
नेहा, मुझे बिल्कुल बूरा नहीं लगा।
फिर तुम इतना रोई क्यों?
ताकि कोई मेरा मज़ाक ना उड़ाए।
मुझे तो याद भी नहीं, मेरी माँ कैसी थी।
सुधा जगदीश सरदेसाई।
क्या?
मेरी माँ का नाम है।
उसका नाम और अल्बम के फ़ोटो
के अलावा मुझे उसकी पहचान नहीं है।
दीदी, आप इतना दिल पे क्यों ले रही हो?
मैं आपसे कहा ना मेरे पास दूसरी शादी करने का समय नहीं है।
नहीं, नहीं, मैं जज़बात में बहकर कोई फ़ैसला नहीं लूँगा।
मैं किसी के लिए कोई समझौता नहीं करूँगा।
हाँ, मैंने तय कर लिया है।
नहीं, सावि को परेशानी नहीं होगी।
तुम्हें झूठ लग रहा है?
मैं उसी से पूछता हूँ। सावि...
क्या तुम्हें किसी चीज़ की कमी है?
मुझे दूसरी शादी करनी चाहिए?
बताओ।
क्या तुम्हें माँ की याद आती है?
मुझे सच बताओ।
नहीं, बिल्कुल नहीं।
शाबाश! मुझे पता था।
हम जज़बाती बेवक़ूफ़ लोग नहीं हैं।
हम व्यावहारिक हैं, ठीक है?
दीदी, आपने सुना ना?
मैं आपको वही बता रहा था,
पर आपको मुझपर विश्वास ही नहीं हैं!
तो?
वस्तुस्थिती का स्वीकार करना,
और फ़ैसला लेते समय, व्यवहारिक रूप से सोचना,
यह मैंने तभी तय कर लिया था।
वैसे तो था ही,
पर तब और पक्का हो गया
मैं अपने पिताजी की बेटी थी।
उन्होंने ही मुझे बड़ा किया था।
इसलिए, मैं व्यवहारिक, रूखी और मुँह पर जवाब देने वाली में से थी।
नमस्ते, सावि।
नमस्ते, पानसे चाचा।
आप आए, मतलब पिताजी भी आए होंगे।
अब तक नहीं आए।
शंकर उन्हें लेने गया है।
कल न्यायालय से कागज़ात मिलने में देरी हुई,
इसलिए वे आज सुबह निकले।
-रमाबाई? -हाँ?
सावि दीदी का नाश्ता जल्दी तयार करो।
जॉन...
माफ़ कीजीए, दीदी।
मुझे आपका करार के बारे में याद है।
जब साहब लौटेंगे, तो मैं उनसे बात करूँगा।
ठीक है।
नमस्ते, सर!
ठीक है।
आओ।
यह मेरी पत्नी है, अमला।
यह जॉन है।
यह रमाबाई हैं।
यह पानसे, मेरे सचिव,
और यह है मेरी बेटी, सावि। सावित्री।
और यह मेरा घर है।
आज से, यह तुम्हारा भी है।
जॉन, इनका सामान मेरे कमरे में रख दो।
जी।
सफर से थक गई होंगी।
आराम करो।
बाकी सब, सावि समझा देगी।
मुझे कुछ काम है। पानसे, चलिए।
मैंने सुना, आपने कोर्ट में जो सवालात किए वह अच्छे थे।
हाँ, गवाह झूठ बोल रहा था, फ़ैसला हमारे हक में होगा।
मोकाशी से मिलने का समय तय करो।
मुझे तैराकी के लिए जाना है।
चलो, लड़कियों।
तीस सेकंड देरी हुई। और तेज़ होना चाहिए।
-हाँ। -ठीक है?
इससे थोड़ा और तेज़ तैरती तो मैं मर जाती।
-नेहा, एक मज़ेदार बात बताऊँ? -बताओ।
मेरे पिताजी ने शादी कर ली।
क्या?
आज अपनी नई पत्नी को साथ लेकर घर आए।
उन्होंने तुम्हें बिना बताए, शादी कर ली!
मतलब वे दूसरी शादी के लिए तैयार नहीं थे ना?
हाँ, पर उन्होंने कर ली।
हे भगवान!
अब?
अब क्या?
घर में इतने सारे नौकर हैं, एक और सही।
सावि, वह क्या नौकर है क्या?
वह तुम्हारे परिवार का हिस्सा है।
यह सच है।
वह कैसी है?
ठीक है, कुछ खास नहीं।
हमसे कुछ सात या आँठ साल बड़ी होगी।
सावि, मुझे लगता है...
तुम्हारे पिताजी को लगता होगा
के तुम अकेलापन महसूस कर रही होगी।
इसलिए उन्होंने दूसरी शादी की होगी।
नेहा, चुप करो।
हमारे घर में इतने नौकर है,
और पिताजी के मुवक्किल आते-जाते रहते हैं।
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