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तीन तरह के लोग होते हैं।
कुछ जो ऊपर होते हैं,
कुछ जो नीचे होते हैं,
और कुछ जो गिर जाते हैं।
मंज़िल 48।
-कोठरी। -हाँ।
कोठरी।
और महीने की बस शुरुआत हुई है।
इसलिए सवाल यह है...
कि हम क्या खाएँगे?
हम क्या खाएँगे?
ज़ाहिर है, ऊपर वालों का बचा-खुचा।
-ऊपर क्या है? -मंज़िल 47। ज़ाहिर है।
मेरा नाम गोरेंग है।
कृपया कोठरी में अपनी तरफ़ ही रहो।
गोरेंग।
आपका क्या नाम है?
हाँ।
हमें एक-दूसरे का नाम पता होना चाहिए।
काफ़ी वक्त एकसाथ बिताएँगे।
या फिर नहीं।
क्या पता?
मेरा नाम त्रिमगासी है।
मिस्टर त्रिमगासी, आपको कोठरी के नियमों के बारे पता है?
ज़ाहिर है, बात सिर्फ़ खाने की है।
कभी-कभी बहुत आसान होता है।
कभी बहुत मुश्किल होता है।
मंज़िल पर निर्भर करता है।
खुशकिस्मती से, मंज़िल 48 के हालात अच्छे हैं।
क्या नीचे कई लोग हैं? रुकिए, बताने की ज़रूरत नहीं।
ज़ाहिर है।
बहुत जल्द, वहाँ इतने लोग नहीं होंगे।
-ए, मेरी आवाज़ सुनाई दे रही है? -उन्हें आवाज़ मत दो।
-क्यों नहीं? -क्योंकि वे नीचे हैं।
ऊपर वाले जवाब नहीं देंगे।
-क्यों? -ज़ाहिर है, क्योंकि वे हम से ऊपर हैं।
आपके लिए हर बात ही ज़ाहिर है, क्यों? आप काफ़ी वक्त से यहाँ हैं।
महीनों से। कई महीनों से।
फिर भी कहता हूँ, मंज़िल 48 के हालात अच्छे हैं।
खुद को ख़ुशकिस्मत समझो।
हम कब तक इस अच्छी मंज़िल पर रहेंगे?
कम से कम एक महीना।
उसके बाद देखेंगे।
और अब मैं किसी और सवाल का जवाब नहीं दूँगा।
बात करने से मुझे थकान होती है।
ख़ासकर तब, जब जितना पता चलता है, उससे ज़्यादा बताना पड़े।
ज़ाहिर है, यह ठीक नहीं है।
इसलिए अब से,
जितना तुम मुझे बताओगे, मैं भी तुम्हें उतना ही बताऊँगा।
लाल बत्ती बंद है। हरी बत्ती जल रही है।
मैंने आपको जानकारी दी। अब जवाब में आपको कुछ बताना होगा।
लाल बत्ती बंद क्यों हो गई?
यह तो खाया हुआ खाना है।
ज़ाहिर सी बात है, मैं "ज़ाहिर है" नहीं कहने वाला।
सरासर घटियापन है।
अच्छा।
अगर हमारे ऊपर 47 मंज़िलें हैं, और हर मंज़िल में दो लोग हैं,
तो हम 94 लोगों का बचा-खुचा खा रहे हैं।
चिंता मत करो।
जल्द ही, ऊपर इतने लोग नहीं होंगे।
-खाओगे नहीं? -मुझे भूख नहीं है।
भूख लगेगी।
लोग कैसे कम हो जाएँगे?
यह तो नहीं कहूँगा कि ज़ाहिर बात है, क्योंकि ज़ाहिर बात नहीं है।
जब तक मैं मंज़िल आठ पर नहीं गया था, मैं खुद भी समझ नहीं पाया था।
शराब!
ऊपर की मंज़िल वाले मुसलमान और शराब न पीने वाले रहे होंगे।
आमतौर पर, शराब यहाँ तक नहीं पहुँच पाती।
तुम सच में नहीं खाओगे?
बाद के लिए है।
आपने ऐसा क्यों किया?
नीचे वाले इसे खा सकते हैं।
ऊपर वालों ने भी यही किया हो तो?
शायद करते ही होंगे।
कमीने कहीं के।
-गर्मी लग रही है क्या? -गर्मी बढ़ेगी।
बढ़ेगी?
एक मिनट में हमारा उबलने जैसा हाल होगा।
अच्छा? क्यों?
तुम्हारी वजह से।
बिना किसी रोक के, तापमान बढ़ेगा, अगर...
-अगर क्या? -अगर तुमने वह सेब न गिराया।
जब तक मंच हमारी मंज़िल पर है, तभी उस खाने पर हमारा हक है।
अगर तुम कुछ रख लेते हो तो तापमान इतना बढ़ेगा कि हम झुलस जाएँगे।
या फिर तब तक कम होगा जब तक जमकर मर नहीं जाते।
कभी कुछ, तो कभी कुछ।
धत्।
आई बात समझ में?
आई बात समझ में?
क्या?
यह बात समझ में आ गई कि अंदर आने पर, मियाद पूरी होने से पहले नहीं जा सकते?
तो, मुझे अपना लिया गया है।
अभी नहीं।
क्या वह चीज़ किताब भी हो सकती है?
तुम्हारी ज़रूरत की कोई भी चीज़ हो सकती है।
द इंजीनियस जेंटलमैन - डॉन क्विकज़ोट
आपको अपने यहाँ होने की वजह बताना चाहता हूँ।
किस लिए?
ताकि आप भी मुझे अपने यहाँ होने की वजह बताएँ।
ज़ाहिर सी बात है।
मैं सिगरेट छोड़कर "डॉन क्विकज़ोट" पढ़ना चाहता था।
मुझे कहा गया था कि साथ में कोई चीज़ ला सकता हूँ और मुझे लगा...
अपनी मर्ज़ी से यहाँ आए हो?
एक अधिकृत डिप्लोमा लेने के बदले छह महीने रहना था।
एक अधिकृत डिप्लोमा?
क्या मतलब है तुम्हारा?
फिर तो मुझे दो मिलने चाहिए।
मैं यहाँ एक साल के लिए रहूँगा।
आप यहाँ किस लिए हैं?
तो, इसे एक मिलेगा और मुझे कुछ नहीं मिलेगा?
तुम्हारी जगह मैं होता तो निकल जाता।
-तुम आज भी नहीं खाओगे? -ज़ाहिर है, नहीं।
सब बेकार है।
तुम इस मंज़िल के लायक ही नहीं हो।
आपने बताया नहीं कि आप यहाँ कैसे आए।
चलिए, अब बताइए।
ठीक है, पर अगर तुम वादा करो कि "ज़ाहिर है" शब्द को नहीं चुराओगे।
घर पर एक दाढ़ी वाले को देख रहा था जो चाकू धार करने वाले औज़ार का विज्ञापन कर रहा था।
उसने कहा, "सामुराई-मैक्स से हर चाकू की धार बना सकते हैं, सीधी हो या दाँतेदार।"
"इस चाकू को देखिए।
कितना बेजान है, इससे एक स्पंज भी न कटे।
सामुराई-मैक्स के इस्तेमाल से, सख़्त से सख़्त सतह को चीर डालें, इस ईंट को भी।"
और वही हुआ।
उसके बाद, कई गृहिणियाँ आईं
और उन्होंने दावा किया कि सामुराई-मैक्स से उनकी ज़िंदगियाँ बदल गईं।
"हम टमाटर भी नहीं छील पाते थे,
और ब्रेड का चूरा हो जाता था।
सामुराई-मैक्स से हमारी ज़िंदगियाँ बदल गई हैं," सभी ने कहा।
सच कहूँ तो, मैंने कभी टमाटर नहीं छीला।
और कटी हुई ब्रेड ही खरीदता हूँ।
रसोई वाले चाकू से किसी को ईंट काटने की भला क्या ज़रूरत पड़ सकती है?
पर मैं सोचने लगा।
मैं अपनी चाकुओं की धार क्यों नहीं बनाता?
उन्हें धार न करने की वजह से अगर मेरी ज़िंदगी बेकार हो गई हो तो?
क्योंकि मैं छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं देता?
-छोटी बातों पर, गोरेंग। -तो फिर आपने खरीदा?
-ज़ाहिर है, खरीदा। -फिर क्या हुआ?
क्या आपने अपने चाकू को धार किया और किसी का गला काट दिया?
मैंने उन्हें खरीदा और अगले विज्ञापन का इंतज़ार करता रहा।
वही दाढ़ी वाला और वही गृहिणियाँ फिर से आए।
सोचो कि इस बार वे क्या बेच रहे थे।
एक ऐसा चाकू जिसकी धार ईंट काटने पर भी खराब नहीं होगी।
काटते वक्त, खुद-ब-खुद उसकी धार बन जाती है।
पता है उसका नाम क्या था?
-सामुराई-प्लस। -तुमने भी खरीदा था क्या?
-नहीं। -ज़ाहिर है, वे मुझे देखकर हँसे।
छोटी-छोटी बातें।
छोटी-छोटी बातों से मेरा दिमाग ठिकाने न रहा।
मैंने अपना टीवी उठाया,
उसे खिड़की के बाहर दे मारा,
और वह किसी ग़ैरकानूनी अप्रवासी के ऊपर जा गिरा जो मोटरसाइकल पर था।
उस बंदे की मौत का कसूरवार मैं हूँ क्या?
उसे तो वहाँ होना ही नहीं चाहिए था।
आपको यहाँ किसी का कत्ल करने के लिए लाया गया था?
मुझसे पूछा गया था, मनोवैज्ञानिक वार्ड या फिर कोठरी।
इसलिए मैं यहाँ आ गया।
जबकि उन्होंने मुझे अधिकृत डिप्लोमा देने की बात नहीं की।
यहाँ कितनी मंज़िलें हैं?
मुझे नहीं पता। कम से कम 132 तो होंगी, क्योंकि मैं उस पर था।
एक सौ बत्तीस।
नीचे और भी हैं।
-कितना खाना नीचे तक पहुँचता था? -कुछ भी नहीं।
बिना खाने के एक महीना काटना मुश्किल है।
यह नहीं कहा कि खाना नहीं खाया।
बस यह खाना नीचे तक पहुँचता नहीं था।
और बिना खाए एक महीना काटा जा सकता है।
अगर लगातार दो नीचे की मंज़िलें मिलें तो, गए काम से।
हमें ऊपर वालों से बात करनी होगी।
किस लिए?
उन्हें अपने खाने का हिस्सा करना होगा।
वे मंज़िल 46 से बात करेंगे।
वे आगे 45 से और बात आगे जाएगी।
तुम साम्यवादी हो क्या?
वाजिब बात कर रहा हूँ। खाने का हिस्सा करना सही होगा।
ऊपर वाले साम्यवादियों की बात नहीं मानेंगे।
तो नीचे वालों से शुरू करेंगे।
ए! नीचे, मंज़िल 49 में जो भी है!
अगली बार हमारे लिए भी शराब छोड़ देना, कमीनों!
यह लो शराब, कमीनों।
नीचे वाले नीचे वाले ही हैं, गोरेंग।
-अगले महीने वे हमसे ऊपर जा सकते हैं। -फिर वे हम पर पेशाब करेंगे।
कमीने कहीं के।
मैं एक किताब लेकर आया हूँ।
तुम क्या लेकर आए?
ज़ाहिर सी बात है।
सामुराई-प्लस।
आप उस सब से थकते नहीं?
लाजवाब है।
इसका जितना इस्तेमाल करूँगा, उतनी इसकी धार बनेगी।
-कोई इंसान था क्या? -हाँ, बिल्कुल।
उम्मीद है कि शराब पीने वाला हो।
वैसे भी शराब की तंगी है।
ऊपर वाली मंज़िलों में जितना मर्ज़ी खा सकते हो।
पर आगे कुछ उम्मीद नहीं होती...
और सोचने के लिए काफ़ी कुछ होता है।
कोई कुछ नहीं करेगा क्या?
अगर तुम्हारी जगह होता, तो मध्य मंज़िलों में रहने की दुआ माँगता।
तुम्हें देखकर लगता है कि तुम ऊपर होते तो कूद जाते।
और तुम्हारी नीचे जाकर रहने की हिम्मत नहीं होती।
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