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लड़कियां अपने घरों में रहें तो ज़्यादा अच्छा है।
स्पोर्ट खेल कूद तो लड़कों के खेल हैं
लड़के खेलना चाहिए। वो ज़्यादा अच्छा है।
लड़की को चाहिए घर में बढ़िया अपने घर में खाना-पीना,
चौका-बर्तन सब ये करे, बच्चों को पाले। उनकी यही सभ्यता है।
हम हैं तो बेटी से क्यों काम कराएंगे?
उसको मन करेगा तो वो शादी होने के वो बाद कर सकती है।
वो हस्बेंड के ऊपर है।
मेरा बेटी को स्पोर्ट्स वग़ैरह में इंवोल्व होने के लिए मना कर देंगे।
हममें कभी-कभी बहुत मन करता है कि हम जवाब देदें।
बट लगता है कि नहीं
आप किसी को मुंह से बोलोगे तो वो भूल भी जाएंगे।
अगर आप अपने तीर से जवाब दोगे तो लोग हमेशा याद रखेंगे।
अगस्त 11, 2016 रियो डी जनेरो, ब्राज़ील
दर्शक सैंबरड्रोमे में भरते हुए,
जो वार्षिक रियो कार्निवल का स्थल है।
इन ओलंपिक खेलों के लिए, जो मेज़बान हैं महिला तीरंदाज़ी प्रतियोगिता के।
ये है भारत बनाम चीन ताइपे
भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए:
महिला तीरंदाज़ी प्रतियोगिता दिन
दीपिका कुमारी।
22 वर्षीय, कुमारी, और बेहद प्रबल रूप में।
खेल शुरू करने लगी हैं।
मैं उम्मीद करती हूं कि इंडिया में
जितनी भी यंग लड़कियां हैं उनको जिनको इतनी सारी प्रोब्लेम्स हैं
वो मुझे देखें और जिस तरह से मैंने फ़ाइट किया है इन सब सारी प्रोब्लेम्स से
वो भी फ़ाइट करके ऊपर आएं
और जो वो अपनी लाइफ़ में करना चाहती हैं वो करें।
बंगलौर में यहां भारतीय खेल प्राधिकरण में
स्वागत है। जैसा कि आप जानते हैं, भारतीय, हंह, तीरंदाज़ी टीम यहां आई है।
हमारी महिला टीम ने विश्व चैंपियनशिप के दौरान योग्यता प्राप्त की थी।
-हमारे साथ दीपिका कुमारी हैं। -हैलो, दोस्तों।
हम रियो में लैंड करेंगे जुलाई नौ को।
अगर आपके पास चंद सवाल हैं तो हम अभी लेना चाहेंगे।
मेरा नाम दीपिका कुमारी है, और ये मेरा दूसरा ओलंपिक गेम्स है।
मेरा अल्टीमेट गोल है गोल्ड।
क्योंकि इससे बड़ा और कुछ भी नहीं।
और एक बार।
प्लीज़ यार रहने दो। दीपिका, दीपिका, एक बार और,
और इस कैमरे में देख कर बोलना।
रैडी, और तीन, दो, एक और गो।
ओलंपिक्स, इससे बड़ा कुछ भी नहीं!
इधर उधर मत देखें।
सिर्फ़ एक चीज़ बची है आपके-- एक पंख जो बचा है, वो है ओलंपिक स्वर्ण।
तो जब आप पोडियम पर खड़े होते हो
तो क्या आता है दिमाग़ में कि मुझे वो गोल्ड चाहिए?
वो भूख वो कैसी है?
ओब्वियस्ली, कोई सिल्वर और ब्रॉन्ज़ के लिए फ़ाइट नहीं करता।
सबको गोल्ड मेडल ही चाहिए होता है।
उस जगह तक पहुंचने के लिए उस गोल्ड मेडल को पाने के लिए
बहुत हार्ड वर्क की ज़रूरत है।
मेरा हमेशा से ये ड्रीम रहा है कि...
जिस कोच ने मुझे सिखाया
वो जब मैं पोडियम पर चढ़ूं जब मुझे मेडल मिले, ओलंपिक मेडल मिले
तो वो कोच के हाथ से मैं पहनूं।
वो, मेरा ये सपना है--
और अब,
ओलंपिक्स फिर से... तो, तैयार हूं मैं।
हर खिलाड़ी को अपनी ज़िंदगी से कुछ बलिदान
करना पड़ता है आपकी हासिल की हुई जगह तक पहुंचने में।
तो थोड़ा पीछे जाते हैं। आपकी बैकग्राउंड जर्नी जो रही है।
मैं रातु की रहने वाली हूं।
जहां मैं रहती हूं वहां लड़कियों को करने के लिए कुछ भी नहीं है।
खेलने का मुझे बहुत मन करता था,
क्योंकि मेरी मंमा मुझे बाहर निकलने नहीं देतीं थीं कभी, क्योंकि मैं घर की बड़ी हूं।
घर का काम होता था
कपड़े धोने होते थे तो ये सब चीज़ें बहुत
सारे काम होते थे इसलिए मम्मी मुझे जाने नहीं देती थीं।
तो लोग बोलेंगे, "कि देखो बड़ी बेटी को बाहर छोड़ दिया।"
ऐसी ही सोच है उनकी।
मेरी मम्मी जो गांव-गांव में होता है छोटे-छोटे हॉस्पिटल वहां काम करती हैं।
ऐसा कोई भी नहीं है जो वर्किंग वुमन है सब हाउस-वाइफ़ ही है।
तो मैं मम्मी से बहुत इंस्पायर हुई थी
और मैं हमेशा चाहती थी कि मैं भी अपने पैरों पर खड़ी रहूं।
खेत में कुछ भी लगा होता था तो बहुत मन करता था
कि तोड़ के लेके चोरी करके लेके आओ, जैसे भुट्टा।
चोरी करने में हम सारे फ़्रेंड्स माहिर होते थे, चोरी करके
खाने में जो मज़ा है ना वो बाइ गॉड कहीं नहीं है
फिर ये...
फिर लाके हम लोग, फ़्राइ करके जलाके खाते थे।
मम्मी सुबह-सुबह चली जाती थीं,
इसलिए पापा के साथ ज़्यादा टाइम स्पेंड किया है, तो उनके ज़्यादा क्लोज़ हूं में।
क्या कर रहे हैं आप?
बंद करो!
क्या ये रोड पे रोज़ झाड़ू, कोई और है जो रोज़ झाड़ू मारे।
मेरे पाप ऑटो ड्राइवर हैं।
ज़्यादा पढ़े नहीं हैं,
लेकिन ज़िंदगी के बारे में
छोटी-छोटी चीज़ों के बारे में वो बहुत ज़्यादा बातें करते हैं।
जब भी उनसे बात करो ना, मतलब लगता है सुनते रहो।
जब बेटी जन्म ले थी तो हम लोग बहुत ख़ुश थे।
पूरा मोटी ताज़ी थी पांच किलो की।
बहुत गुलगुल देखती थी।
तो ये बच्ची जो हुआ, तो रोड पे हुआ।
मम्मी जॉब करती थी लेकिन टाइम से सेलरी नहीं आती थी।
चार महीने के बाद, तीन महीने के बाद एक बार सेलरी आती थी।
इतनी ज़्यादा प्रोबलम हो गई थी।
उस वक़्त खाने के लिए कुछ भी नहीं होता था।
हमारा घर मिट्टी का था।
जब भी बारिश होती थी
या फिर आंधी-तुफ़ान आता था
तो पानी लीक करता था।
तो हम क्या, बर्तन नीचे रखते थे कि घर में पानी-पानी ना हो।
ये हाफ़... हम इधर रहते थे,
और हमारे चाचा-चाची इस तरफ़ रहते थे।
मेरी मम्मी काम करती थी, तो उन लोगों को अच्छा नहीं लगता था तो झगड़े बहुत होते थे।
मेरे चाचा-चाची ने मेरी मम्मा को पीटा था।
थोड़ा सा ग़लती है तो मार-पीट तो हर कोई करता है।
इसलिए कोई उसे आपत्ती नहीं है।
जब वो तीन साल का थी , तो रास्ता में
वो बनीयारे बेचते हैं कुछ-कुछ सामान वो लोग
तो उसमें एक मिट्टी का घर है। वो अभी है मेरे पास।
तो, दीपिका ने घर को उठा लिया, और उठाने के बाद बोली कि पापा:
"पाप, देखिए ये हैलिकॉप्टर है।"
टिप को खोली और बोली कि, इसमें पहले पापा को बैठाएंगे,
उसके बाद मैं बैठूंगी उसके बाद
आपको बैठाऊंगी, और सीधे सुई से उड़ जाऊंगी।"
इतनी छोटी उम्र में
मैं ही वो लड़की हूं जो घर से बाहर निकली।
वहां पे लड़कियां कुछ करती नहीं हैं वो
18 साल की हो जाती हैं तो पैरेंट्स शादी करके भेज देते हैं।
अगर मैं गांव में रहती तो यक़ीनन
18, 19 ईयर्स में तो मेरी शादी पक्की।
बस मुझे गांव की लाइफ़ से दूर जाना था। ये जो सिचुएशन है, जो वहां का माहौल है उससे दूर जाना था।
सेराइकेला दीपिका की पहली अकादमी
जब मुझे आर्चरी के बारे में पता चला तब मैं बारह साल की थी।
किसी ने मुझे बताया था कि सेराइकेला में एक अकादमी है,
और उन्होंने एक बात और बोली कि ये सब फ़्री ऑफ़ कॉस्ट है। आपको इसमें कुछ भी पैसे देने की ज़रूरत नहीं है, और,
और वहां पर फ़्री दिया जाता है खाना या फिर कपड़े।
जब 2006 में फ़र्स्ट मेरे पास आई थी, तो पतली-दुबली थी।
उनके वहां पिताजी के साथ स्कूटर्स में
तीनों 130 किलोमीटर था, स्कूटर में उनके पापा और मदर के साथ आई थीं।
उन्होंने देख मुझे बोला, "ये तो इतनी पतली है! ये कैसे करेगी?"
तो उतने में दीपिका थोड़ा उदास हो गई
कि अब तो मेरा कुछ होने वाला नहीं है।
फिर उसके बाद हमको साइड पर बुला कर बोली, "मम्मी, मैं कुछ बोलूं?" मैं बोली, "बोलो।"
तो बोली, "हमको आप तीन महीना का मौक़ा दीजिए।
तीन महीना के बाद हम चल नहीं सकेंगे, तो आप हमको निकाल दिजिएगा।"
उन्होंने बोला ठीक है। मैं बहुत ख़ुश हो गई।
उस वक़्त भी मुझे आर्चरी में इतना इंट्रेस्ट नहीं था।
मैं आई थी क्योंकि मेरी फ़ैमली कंडीशन बहुत ज़्यादा ख़राब थी।
घर में झगड़े बहुत ज़्यादा होते थे, पैसे वैसे को लेके।
तो मैंने सोचा, मैं चली जाऊंगी घर से बाहर तो
कम-से-कम एक का बर्डन कम हो जाएगा।
ये हमारा किचन हुआ करता था।
यहां पर हम खाना रखते थे और इधर खाना बनाते थे।
उधर हम बर्तन साफ़ करते थे।
तीन रूम होते थे।
पंखे भी नहीं थे, सिर्फ़ बैड था।
कोई कप्बोर्ड नहीं कुछ भी नहीं था।
बाथरूम भी नहीं था, हम नदी में जाते थे नहाने।
एक दिन बहुत बीमार हो गया मेरा बच्चा।
नाला का पानी में नहाती थी पूरा खुजली हो गया।
हॉस्पिटल में एडमिट किए तो हमको बहुत ख़राब लगा।
मुश्किल से एक-डेढ़ साल वहां पर रही
फिर वहां से टाटा चली आई।
जब मैं 13 साल की थी, टाटा आर्चरी अकादमी के लिए सेलेक्शन हो रहा था।
और मुझे किसी भी हाल में वहां पर सेलेक्ट होना था।
जो कोच हैं मेरे, धर्मेंद्र तिवारी वो चूज़ कर रहे थे कि किसको सेलेक्ट करना है।
मुझसे बोली, "टाटा में मैं आपके अंडर ट्रेनिंग करना चाहती हूं।"
मैं बोला, "चलो ठीक है पर मैं जैसे बोलूं वैसे चलना होगा।"
जब यहां पर आई तो बोली कि पापा हम यहां आ गए हैं।
तो, यहां पर धनुष जो मिलता है वो बहुत महंगा मिलता है।
तो बोले बेटा देखो:
"धनुष तो हम ग़रीब आदमी हैं, हम कहां पाएंगे?"
लेकिन मिला-जुला के कुछ थोड़ा बहुत पैसा दिए।
तब तो छोटी बच्ची थी उतना कॉन्फ़िडैंस नहीं था, गांव की बच्ची थी।
कैसे सोना है, कैसे बैठना है,
कपड़ा पहनने का ये सब कुछ नहीं जानती थी ये लोग।
हम लोग के पास आते-आते कैसा करना नहीं है ऐसा पहनना है
ऐसा करके चम्मच से खाना है तो उसके लिए हर चीज़ हम उन लोग को सिखाते थे।
अकेली रहती थी प्रेक्टिस करती थी
जो फ़ॉल्ट है वो बताया जाता था वो उसी में लगी रहती थी।
जितना बोला जाए उतना ही एरो शूट करती है,
और उसका कैच करने का पॉवर भी दीपिका में बहुत ज़्यादा है।
दीपिका का टैलेंट तो एक मिरेकिल के जैसे ही है।
ऐसे बच्चे कम ही देखे हैं कि एक साल में वो कडैट वर्ल्ड चैंपियन बन गई।
भारत की दीपिका कुमारी के लिए आज एक स्वर्ण पदक।
जब मैंने आर्चरी शुरू किया था, तो मुझे पता भी नहीं था
आर्चरी जैसा कोई स्पोर्ट होता है।
फिर देखते-देखते मुझे इंट्रेस्ट आने लगा।
फिर उसके बाद मैं पागल हो गई आर्चरी को लेके।
सोचती थी कि मैं भी कुछ ऐसे अच्छे काम करूं कि लोग मुझे जानें।
लोग मुझे पहचाने की हां, "ये दीपिका है।"
दीपिका कुमारी आ गई हैं
स्वर्ण पदक मैच के लिए।
ये वार कुमारी की जीत के लिए।
दस नंबर। दीपिका कुमारी बन गई हैं कॉमनवैल्थ चैंपियन।
दीपिका कुमारी ने छुआ है अंतरराष्ट्रीय मंच पर महान ऊंचाईयों को।
ये वो बच्ची थी जो निकली थी जीवित रहने की तलाश में।
और उन ऊंचाईयों को देखें जिन्हें चढ़ने में वो सक्षम रही।
वो मौजूद भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि हमारे पास बुनियादी ढांचा ही नहीं
जो इन सपनों को कांधा दे सके।
आर्चर दीपिका कुमारी को चुना गया था पद्म श्री के लिए नई दिल्ली में।
श्री दीपिका कुमारी।
इतनी कम उम्र में पद्म श्री मिला था तो हमारे तो,
ख़ुशी से मेरे आंसु निकलने लगे।
जबसे दीपिका मेरे घर में हुई है, मुझे पैसे की कमी नहीं है।
ये मकान जो आप देख रहे हैं ...
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