Darlings

Darlings (डार्लिंग्स)

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मेट्रो

-उदासी का माहौल मत बनाओ, डार्लिंग। -तो क्या गाना गाऊँ?

-कहा न, माफ़ कर दो। -ये मूनवॉक बगल में करो, चलो।

अरे, थोड़ा देर हो गई, नौकरी के इंटरव्यू में आज।

जैसे मुर्गी जो रोज़ अंडा डालती है न, वैसे आप इंटरव्यू देते हो।

मेरी योजनाओं का क्या होएगा?

मैं बताती हूँ क्या होएगा, फुस्की बम…

शादी होगी और इसी साल होएगी।

मिल गई नौकरी? कहाँ?

अरे, बताओ न, कहाँ?

वो चुनौती दी न, तेरी अम्मी मेरे को? सरकारी नौकरी ले के आया।

-सच? -हम्म।

अभी उनको बोल, बाल में डाई वी लगाके मैनीक्योर-पैडीक्योर करा के तैयार रहे।

शादी मनाते हैं अपुन दोनों।

पोनी खोलो न, डार्लिंग्स।

मस्त है। और दो न!

-सुनो, अ… वो… हाँ। -अंडा दो न।

वो बिल्डर है न। बुधवार को आ रहा है।

इस बार तो मिल लो न, प्लीज।

-मैं कुछ बोल री। -सुना मैं। मिल लूँगा।

तुम बीच में मत पड़ो।

तेरा ध्यान कहाँ रहता है?

आह! अरे! अम्मा…

-सोनू न? तो, एस। -हाँ।

अभी भी गुस्से में हो?

छोड़ो न, डार्लिंग्स। कल रात को थोड़ा ज़्यादा हो गई थी।

खाली कल रात को ज़्यादा हुई?

अभी कौन सी शादी में मियाँ-बीवी के झगड़े नहीं होते?

सबकी पतंग अटकती न इधर, मालूम तेरे को?

लोग न, ऐसे खाने का फोटो खींच के ऐसे ऑनलाइन डालते हैं। फैसन है।

मैं भी डाला। बीवी ने दुनिया का सबसे अच्छा ऑमलेट बनाया।

मस्का ज़्यादा है, तो पाव पे लगाओ न।

अच्छा, चलो, तुम माँगो, जो माँगना है। जो बोले वो।

मेरी जान, तुम लोग आज के जोड़े हैं।

थोड़ा आपस में रहते हैं अभी प्यार वगैरह से।

दो साल की योजना थी। आपने करार भी किया।

अब तीन साल से गर्मजोशी के साथ चल रहा है। हटो।

अरे, लेकिन, अलार्म पे थोड़ी चलती है ज़िंदगी।

थोड़ा सुधार करो योजना में मेरे लिए।

ये बार नहीं, हमज़ा।

सोचो। रात को अपुन दोनों पूरे मूड में, और बच्ची रो पड़ी, तो?

बच्चा। मेरे को बच्ची नहीं, बच्चा चाहिए।

-अच्छा। -नाम भी सोच रखी मैं।

क्या?

राज़ है। बताएगी, जब समय आएगा।

-बोलो न, क्या नाम है? -नहीं।

पिज़्ज़ा ला के दूँगा।

अगली पगार से ढिंचैक नया फ़ोन, बोल। पक्का?

बिल्डर से तो मिल लो पहले। फ़ोन का देखते हैं बाद में।

मेरे अंदर के जल्लाद को उठा ले, मेरे मौला।

सन् 2024 - कार 2022 - हमज़ा संग दूसरा बच्चा

सन् 2021 - हमज़ा संग बड़ा घर 2020 - पहला बच्चा

बदरू, बदरू।

अस्सलाम वालेकुम, चाची।

अम्मी, शरम करो। आठ आने का मिलता है करी पत्ता।

बात पैसों की नहीं है। घर में बैठे-बैठे बेज़ार हो जाते हैं।

-अब क्या की? -कंकड़। लाओ।

टीवी में आँख घुसेड़कर अगर चावल चुनेगी तो और क्या होगा।

-ये लो। -बिल्डर का पूछी?

मान गए अब। नज़र न लगे, मिलेंगे इस दफ़ा।

ये विदेशी मुर्गी लोग भी कितने गबदुल होते हैं न?

तू भी बचपन में ऐसे ही गबदुल थी।

बगल से सिर्फ़ गाल ही गाल दिखते थे। नाक तो दिखती ही नहीं थी।

बेटा अभी भी देर नहीं हुई है।

कल भूनकर देखें, अम्मी।

कल पोटला बाँध के घर आ वापिस।

अम्मी, कोशिश कर रही हूँ मैं।

पिछले तीन साल से ये शक्ल-सूरत का

धोबी दला बना के रख दिया है उस आदमी ने।

पिटाई, फटके, धुलाई चल ही रहा है।

अम्मी, समय लगता है।

ऐसे मुनसीपैलिटी का नल थोड़ी है।

खोला तो फुर्र पानी, बंद किया तो खतम।

ये ऐसे ठीक नहीं होएगा।

टेढ़ा सोचती हूँ।

ये तो एक दिन इतना मारेगा न कि मर जाएगी मेरी बच्ची। फिर क्या करेगी?

बराबर साफ़ किया न? हम्म?

सर, ऐसा चमक रहा है, संडास के टाइल पर मिसल रख के खा सकते हो।

ए… खाने तो देता।

-सर, एक बात बोलूँ। -हम्म?

कभी-कभार ठीक है, सर, लेकिन ये रोज़ तो मत करवाओ।

-टीसी है मैं। -ये ले। बात ऐसे करता है जैसे कि डीएम है।

सीएम है, पीएम है। हाँ? टीसी। टॉयलेट क्लीनर।

ये तो सब पिछले हफ़्ते का ही सामान लाया है तू। क्या है ये?

कैसी बात कर रही हो, खाला। ये सब नया है। वो अमीना भी लुढ़क गई न, सुबह को।

टोस्टर और मिक्सी वहीं से लाया हूँ। पुराना कैसे हो सकता है?

-वो खान साहब की जोरू? -हाँ। दूसरी वाली भी गई।

सीधे वहीं से आया हूँ।

-बिचारी। मिक्सर दिखा। -ये लो।

इसका… ढक्कन? हाँ।

-कित्ते का है? -आपके लिए चार सौ में दे सकता हूँ।

-ठीक है, सौ। -सौ में कैसे आएगा? ये एकदम नया है।

-अभी-अभी प्लास्टिक निकाला है इसका। -ठीक है, सौ।

खाला, अमीना अभी इस्तेमाल करने ही वाली थी कि वो टें…

-सौ। -तीन सौ पचास तक जा सकता हूँ मैं।

-देना है तो ले लो, नहीं तो वापस करो। -सौ।

सौ में नहीं आएगा! देयो वापस।

पागल हूँ क्या मैं? इतना वक्त बर्बाद करवा दिया मेरा।

जा रहा हूँ मैं। बाँध रहा हूँ।

-हैलो, ज़ुल्फ़ी। -हैलो।

-कैसे हो? अदरक डाला है। तुम्हारे लिए। -ठीक हूँ।

शुक्रिया।

मिक्सी ले रहे हो, अम्मी। कितने में दी?

-जो खाला बोली। सौ। -सौ।

चल दे दे इसको सौ।

-हाय अल्लाह, सिर्फ़ पचास हैं। -पचास? बाकी के पचास कहाँ गए?

अभी बार-बार लगती है, तो बड़ा वाला टूब ली मैं सोफ़रामाइसिन का।

तो हल्दी नहीं लगा सकती थी, मल्लिका-ए-आलम?

अब दे बिचारे को। ले ले बेटा। ले ले बेटा, ले ले।

पैसे बाएँ हाथ से नहीं लेते। अपशकुन होता है। चाय दे दो।

शुक्रिया।

बाय, ज़ुल्फ़ी।

- बाय। स्वागत है। -शुक्रिया।

सुन, अगर ग्रिल ओवन मिले तो बताना।

- पचास में? -नहीं, सौ।

बेचारा ज़ुल्फ़ी।

तेरे को सब बिचारे ही लगते हैं।

मैं क्या बोली? सोची कुछ योजना?

-क्या? -अगले जुम्मे को मटन करी बनेगी।

-सलाम वालेकुम, कासिम भाई। -वालेकुम अस्सलाम।

- सलाम। -वालेकुम अस्सलाम।

अम्मी, आप मटन लो। मैं सालन का बाकी सामान लेकर आती हूँ।

हाँ? टमाटर, प्याज़, सब खतम हो गया है।

नहीं, वो… मुनीर भाई जान।

वो दारू छुड़वाने की दवा बोले थे न आप।

दारू किसी का छूटेला है आज तक, जो तेरे हमज़ा का छूटेंगा?

दे दे कोई एंटीबूज़।

उससे होता क्या है असल में?

ज़्यादा कुछ नहीं। पहले खतरनाक वाली एलर्जी होएँगा।

फिर काली नीली पापड़ माफ़िक थोबड़ा हो जाएँगा।

अदरक वाली चाय भी हलक से उतरेंगा नहीं। दारू क्या घंटा पिएँगा?

-सुरक्षित है न? -अरे, ज़्यादा चिंता मत करो।

थोड़ा तकलीफ़ होएगा, लेकिन ज़िंदगी सुरक्षित रहेगा।

-हमज़ा भाई मान गए क्या? -हाँ।

अच्छा, पर अभी तुम दोनों नाके पर प्रचार मत करो।

चिंता मत करो।

-क्या निशानची लोग? -ए, हमज़ा भाई। हमज़ा भाई।

-दे न! -हाँ।

-बैठो न, भाई। -नहीं-नहीं, खेलो!

-खाते में! - हाँ।

खाते में तो लिख लेंगे हमज़ा भाई, लेकिन कल से इसका ज़रूरत नहीं पड़ेंगा।

काहे को बे?

वो इधर, किधर तो भी सुना मैं, आप दारू छोड़ रे ले।

मैं काहे को नहीं सुना?

ए जाने दो न, भाई, वो ऐसे ही बोल रहा है। क्या तुम भी, भाई।

तेरे को बोला था न, खजूर। निकाल सौ का पत्ता।

अरे तुमको मना किया था न मैंने, एंटीबूज़ के बारे में चर्चा करना नहीं।

हमज़ा भाई दारू छोड़ रहे हैं।

डार्लिंग्स!

हाथ मुँह धो लो। मस्त खाना बनाया है आज।

-हम्म? -हाँ।

अम्मी को देखते-देखते अम्मी जैसी बनते जा रही है।

क्या खराबी है अम्मी में?

अब्बू के जाने के बाद घर-घर काम करके खुद पाली वो मेरे को, सोचो, अकेले।

खाना बनाना भी तो अम्मी सिखाई न?

तो, आज क्या पक री खिचड़ी?

आँखें ठीक करवाओ। खिचड़ी नहीं, मटन का सालन है।

अच्छा।

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