ആദ്യത്തെ 200 വരികൾ.
खंडन यह फ़िल्म एक काल्पनिक रचना है और इस फ़िल्म
में दिखाए गए सभी पात्र काल्पनिक हैं। किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई भी समानता
संयोग मात्र है। इस फ़िल्म का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, जाति, समुदाय, वर्ग या धर्म की
भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।
1982 उत्तर प्रदेश में कहीं
चलो भाई आगे बढ़ो!
किसकी बारात है?
छोड़ ना। तू पत्ते देख।
यह क्या है!
अबे ए! बंद कर!
साले फड़-फड़ फटाका फोड़ रहे हो!
अबे किसी के घर में घुस के फटाके फोड़ोगे?
तुम्हारा दूल्हा घोड़ी पर कैसे बैठा है?
उतारो इसे नीचे।
अब तुम्हारा दूल्हा हमारे घर के सामने से घोड़ी पर चढ़कर निकलेगा?
और तुम साले! हमारे सामने पगड़ी पहनकर नाचोगे!
ओए नीचे उतर!
गली के बाहर जाकर घोड़ी पर बैठना।
पुरानी बात और थी ठाकुर साहब।
अब समय बदल गया है।
आजकल के लड़के कहाँ मानते हैं ये सब?
समय बदल गया तो क्या समाज के तौर तरीके बदल जाएँगे!
हाँ?
अबे तू अभी तक ऊपर बैठा है?
कल्लन! जाओ जरा!
जबरदस्ती मत कीजिए ठाकुर साहब।
-जवान लौंडे हैं। दारू पी रखी है। -हट!
-झगड़ा हो जाएगा बेकार में। -तुम हमको धमकी दे रहे हो?
और हम तुम्हारी धमकी से डरेंगे?
अरे ए कल्लन उतार साले को नीचे!
-उतर नीचे! - जल्दी!
-चल उतर! -ए ठाकुर साहब, अरे रोकिए इनको।
औकात में रहो रूपराम तुम!
-ए! -हट!
यह ठाकुरों का मोहल्ला है। जीना मुश्किल हो जाएगा।
तू भाग यहाँ से!
बस, बस!
हो गया।
आखिरी बार।
-थोड़ा और ताकत लगा। -बस थोड़ा सा।
बस हो गया।
जाओ, जाओ। ज़रा बच्चे को कपड़ा लेकर आओ।
यह देखो।
लो।
दो चाची।
अरे क्या हुआ मंजु, ज़रा बता मुझे?
दादी वह बिटिया हुई है।
अरे मेरे तो भाग फूटे!
मौत भी नहीं आती इसे!
चौथी बार भी बेटी।
लाओ इसे मुझे दो!
-मैं इसे ज़हर चटाने नहीं दूँगी अम्मा। -ला दे मुझे!
खोल दरवाजा!
-भगवान को बिटिया ही मंजूर है तो क्या करें? -नासपिटी!
करमजली!
बेटियाँ ही पैदा करती है!
ऊपर से जबान लड़ाती है!
दे मुझे, जल्दी दे!
अम्मा जी नहीं दूँगी!
क्या हुआ?
अरे मैं पूछती हूँ क्या हुआ मेरे बेटे को?
ठाकुर मोहल्ले में गोली चली और बीच बचाव में मारे गए।
अरे हे राम जी! ए मेरे लल्ला!
रे मेरे बच्चा!
अरे मेरे रूपराम क्या हुआ रे?
बेटी नहीं, डायन जनी है डायन!
पैदा होते ही अपने बाप को खा गई!
देखना एक दिन यह सबको खा जाएगी!
आओ, थोड़ा मज़े करते हैं।
-हाँ मैडम नमस्ते। -हम्म।
मैडम वह एक किताब नहीं मिल रही है बड़े दिनों से।
कौन सी?
वह वात्स्यायन जी की।
कामसूत्र।
पिछवाड़े में ना झाड़ू डालके मोर बना दूँगी।
इससे पहले कि आई कार्ड छिन लूँ, निकलो यहाँ से!
चलो निकलो!
छटांग भर की नुन्नी हुई नहीं, पढ़ेंगे कामसूत्र।
हमारा नेता कैसा हो?
इन्दु भैया जैसा हो!
-इन्दु भैया के वास्ते… -हम देंगे सब रास्ते!
जीतेगा भई! जीतेगा!
इन्दु भैया जीतेगा!
जीतेगा भई! जीतेगा!
इन्दु भैया जी--
जी?
लाइब्रेरी में चुनाव प्रचार की अनुमति नहीं है।
तो दे दीजिए अनुमति।
लिखित में आवेदन देना होगा।
आवेदन यहीं देना होगा?
या हॉस्टल में?
हॉस्टल में।
मोहित! निकल आ बे!
तुम्हारे लिए।
बॉम्बे से है।
-अरे वाह। -बहुत महंगी है।
तारा सस्ता माल तो वैसी भी नहीं पहनती।
मैंने सोचा तुम मुझे तोहफा चुनाव जीतने के बाद ही दोगे।
वह तो हम जीत ही रहे हैं।
इसमें कोई शक है क्या?
फिर छात्र संघ के अध्यक्ष बनेंगे।
फिर विधायकी का टिकट।
मंत्री।
फिर क्या पता एक दिन सीएम।
मेरे सीएम!
पतलून तो पहले बांध लो ठीक से।
अच्छा सुनो…
मैं बताना तो नहीं चाह रही थी…
पर मैं पेट से हूँ।
फिर से?
क्या तुम ध्यान नहीं रख सकती?
मेरी क्या गलती है इसमें?
तुम्हें ध्यान रखना चाहिए था।
पिछली बार भी मुझे दोष दिया और इस बार भी।
ठीक है।
मुरारी से कह देंगे, तुम्हें लखनऊ ले जाएगा। गर्भपात करवा देगा।
इस बार गर्भपात ना करूँगी।
तो फिर क्या करोगी?
शादी।
किससे?
तुमसे और किससे?
तुम होश में तो हो?
15 दिन में चुनाव हैं।
और तुम्हें शादी की पड़ी है।
अरे तो मैं कहाँ कह रही हूँ कि सबके सामने खुलकर करेंगे शादी।
मंदिर में चार फेरे ले लो।
बाद में बता देंगे सबको।
तुम्हारे मन में शादी का कीड़ा कहाँ से आ गया?
देखो, मुझे पता है…
हमारी शादी तुम्हारे परिवार को तो मंजूर ना होगी।
पर ऐसा हमेशा तो नहीं चल सकता ना त्रिपाठी जी।
क्यों?
चल सकता है।
तुम्हारी जहाँ शादी हो वहाँ कर लो।
हमारी जहाँ होगी हम कर लेंगे।
पर प्यार करते रहेंगे… ज़िंदगी भर।
इसके लिए शादी की आवश्यकता नहीं है।
तो क्या रखैल बनाकर रखना चाहते हो मुझे?
यह भी परंपरा थी।
पुराने दिनों में,
हमारे बड़े बुजुर्ग तुम्हारे यहाँ की औरतों को रखैल रखते थे।
कौन सी नई बात है?
तो एक बार अपने बड़े बुजुर्गों से यह भी पूछ लेना,
कि तुमने भी किसी रखैल का दूध तो नहीं पिया है।
अब तुम उकसा रही हो हमें।
तुम्हारे स्तर पर गिरकर बात नहीं कर सकते ना हम।
अपने पूज्य बाबूजी की कसम
हमने तुम से कभी शादी का वादा नहीं किया।
हाँ प्यार किया है।
और वह जीवन भर करने का ऑफर भी दे रहे हैं।
सोचकर बता देना।
भाग कहाँ रहा है हरामी?
रूक!
साले!
डर गया क्या?
रखैल बनाकर रखेगा मुझे!
इन चार चेले चपाटों के बिना घूम तो सकता है नहीं।
कायर कहीं का!
बुज़दिल डरपोक!
इस अधमरे कॉलेज तक का चुनाव तू नहीं जीत पाएगा इंद्रमणि।
-जाने दे उसे। -गलत लौंडिया से पंगा ले लिया है।
तू नहीं जानता मैं क्या चीज़ हूँ!
ये तेरे सारे प्रेम पत्र पूरे कॉलेज में बँटवाकर तुझे नंगा ना किया ना
तो मेरा नाम भी तारा नहीं!
किसी के बाप का माल ना हूँ कि इस्तेमाल किया और फेंक दिया।
अरे बड़ा आया छात्र नेता!
कहता है सीएम बनेगा। सीएम बनेगा यह!
शक्ल देखो इसकी।
कायर कहीं का! थू!
बुज़दिल डरपोक!
मैं इस्तेमाल करने जैसी चीज़ नहीं हूँ।
दूसरी लड़कियों की तरह नहीं हूँ मैं।
देखती हूँ कैसे जीतता है यह कॉलेज का चुनाव!
इन्दु!
इस पूरे प्रदेश में
तुम्हें सिर्फ यह कोटे वाली लड़की ही मिली?
क्या संबंध है तुम्हारा इस लड़की से?
कुछ नहीं बाबूजी।
नौकरी दिलवाने में मदद की थी।
स्थाई नहीं हो रही। कुछ भी बक रही है।
बाहर जाकर यही सब बकेगी तो?
क्या प्रतिष्ठा रह जाएगी त्रिपाठी परिवार की?
हम हैं ना। हम देख लेंगे।
वही तो हम जानना चाह रहे हैं।
-कैसे देखोगे? -समझाएँगे।
बात करेंगे। गलतफहमी दूर करेंगे।
आपकी तरह गोली तो नहीं मार सकते ना बाबूजी।
क्यों नहीं मार सकते, हाँ?
यह तो तुम्हारे राजनीतिक जीवन की शुरुआत है।
बहुत सपने देखे हैं तुम्हारे लिए।
ऐसे ही माथे पर दाग लगते नहीं देख सकते।
महिला का मामला है।
काबू करो।
वर्ना विधायक या मंत्री तो क्या,
किसी टुच्चे से कॉलेज का चुनाव भी नहीं जीत पाओगे।
समझे?
भैया कॉल किए थे।
बोले, मुरारी तारा को लखनऊ ले जाना है डॉक्टर के पास।
हम बोले क्यों बार बार।
लेकिन आप जो यह भैया के घर
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