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दिल्ली 2007
-अब मैं टकीला पियूँ क्या? पर मैं… -क्यों नहीं?
-महाराज, मेरे लिए गाना गाओ! गाओ! -गाओ!
वह सड़क के इस तरफ़ क्यों है? यह क्या हो रहा है? क्या?
-वह ऐसे क्यों चला रहा है? -मैडम, मैं गाड़ी चलाऊँ?
-डर लग रहा है, महाराज? -न, डर नहीं लग रहा।
तुम्हें डर लग रहा है।
मैडम, गाय!
गाय तो हिलने से रही।
अरे गाय, सो जाओ!
यह सबसे अच्छा जन्मदिन रहा। मैं कभी नहीं आ पाती अगर…
हैपी बर्थडे टू यू…
हे भगवान।
हैपी बर्थडे टू यू
तुम कितने…
हैपी बर्थडे, डियर पिंकी
हैपी बर्थडे…
माफ़ कीजिए, कहानी की शुरुआत ऐसे नहीं होनी चाहिए।
आखिर, मैं भारतीय हूँ,
और यह मेरे लोगों की एक पुरानी और पूजनीय प्रथा है
कि कहानी की शुरुआत किसी महान शक्ति की पूजा से करें।
इसलिए मुझे भी किसी भगवान के चरण स्पर्श करने चाहिए, पर किस भगवान के?
मुसलमानों के एक हैं। ईसाईयों के तीन हैं।
और हम हिंदुओं के 36 मिलियन हैं।
कुल मिलाकर, 36 मिलियन
और चार पवित्र पैरों में से किसी को चुनना है।
कुछ सोचते हैं कि इनमें से किसी का भी अस्तित्व नहीं है,
पर मेरे देश में, दोनों सूरतों में फ़ायदा होता है।
भारतीय कारोबारी ईमानदार और बेईमान, दिखावा और भरोसा करने वाला,
चालाक और सच्चा, सब कुछ एक साथ होना चाहिए।
चीन के प्रधानमंत्री, वेन जायबाओ,
भारत के प्रमुख कारोबारियों से मिलने के लिए इस महीने भारत आएँगे।
वह बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में जानना चाहते हैं।
इन आर्थिक महाशक्तियों की मुलाकात पर दुनिया भर की नज़रें टिकी हैं।
बैंगलोर 2010
उम्मीद है कि जायबाओ…
मिस्टर जायबाओ, हुज़ूर।
जब पता चला कि आप भारतीय कारोबारियों से मिलने आ रहे हैं,
मुझे पता था कि आपको ईमेल करना ही चाहिए।
सेवा में : महामहिम वेन जायबाओ, प्रधानमंत्री कार्यालय, बीजिंग।
भले ही हमारे देश में पीने के पानी, बिजली,
सीवेज सिस्टम, जन-परिवहन,
सफ़ाई की समझ, अनुशासन, शिष्टाचार या वक्त की पाबंदी की कमी हो,
पर कारोबारियों की कमी नहीं है।
प्रधानमंत्री जायबाओ भारत की फलती आउटसोर्सिंग अर्थव्यवस्था जानना चाहते…
मैं कुछ समय से, आपके देश की तरक्की देखता आया हूँ, जनाब।
मुझे पता है कि आप चीनी लोग आज़ादी और व्यक्तिगत स्वाधीनता बहुत पसंद करते हैं।
अंग्रेज़ों ने आपको अपना नौकर बनाना चाहा,
पर आपने ऐसा होने नहीं दिया।
कमाल की बात है, प्रधानमंत्री साहब।
ऐसा है कि एक वक्त था जब मैं भी एक नौकर था।
आज, मैं भारत की सिलिकॉन वैली, बैंगलोर में एक जाना-माना कारोबारी हूँ।
कहते हैं कि इसका नाम अमरीका की सिलिकॉन वैली पर रखा गया,
पर शायद हम इस बात पर सहमत हो सकते हैं कि अमरीका बीता हुआ कल है।
भारत और चीन आने वाला कल हैं।
इस यकीन के साथ कि देश का भविष्य
एशियाई लोगों और भूरी चमड़ी वाले के हाथ में है,
अब जब हमारे पुराने मालिक, गोरी चमड़ी वाले ने खुद को
लौंडेबाजी, सेल फ़ोन के इस्तेमाल और नशे में झोंककर खुद को बर्बाद कर लिया,
मैं आपको मुफ़्त में ही
अपनी ज़िंदगी की कहानी सुनाकर भारत का सच बताना चाहूँगा।
ये मेरे परिवार के सबसे खाते-पीते और अहम सदस्य हैं।
इनके बाद, मेरी चालाक, बूढ़ी दादी, कुसुम आती हैं।
उन्होंने मेरे भाई किशन को चाय की दुकान पर ज़बरदस्ती काम पर लगाया।
और रिक्शा चलाने वाले मेरे पिता से एक-एक पैसा ले लेती थी।
मैं लक्ष्मणगढ़ गाँव का बाशिंदा हूँ, जो अंधेरे में डूबा हुआ है।
भारत में दो अलग-अलग देश बसते हैं,
एक भारत रोशन है,
और दूसरा अंधेरे में डूबा है।
शायद आप जैसे अमीर इंसान को पता है कि मैं किस हिस्से से आता हूँ।
अपने बारे में मूल रूप से बताऊँ, तो उस पोस्टर से अच्छा और कुछ था ही नहीं,
जो कुछ साल पहले, कारोबार के चलते,
पुलिस ने मेरे नाम का बनाया था।
बलराम हलवाई - लापता आदमी की तलाश में मदद चाहिए
हाँ, पुलिस को मेरी तलाश है। क्यों?
समय आने पर बताऊँगा,
पर अगर वादा करें कि जब तक अपनी कहानी नहीं सुनाता, आप मेरे बारे में राय नहीं बनाएँगे।
पढ़ो। तुम।
पढ़ना नहीं आता?
"ए, जी, ज़ेड…"
"हम एक महान धरती पर रहते हैं।"
"भगवान बुद्ध को इस धरती पर ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।"
"हम भगवान के आभारी हैं कि हमारा जन्म इस धरती पर हुआ।"
यहाँ आओ, लड़के।
-यह महिला कौन हैं? -महान समाजवादी नेता जी, सर।
और छोटे बच्चों के लिए इनका क्या संदेश है?
किसी भी भूले-बिसरे गाँव का कोई भी गरीब लड़का
बड़ा होकर भारत का प्रधानमंत्री बन सकता है।
जंगल का ऐसा कौन सा दुर्लभ जानवर है
जो एक पीढ़ी में सिर्फ़ एक बार पैदा होता है?
द व्हाइट टायगर।
तुम वही हो। द व्हाइट टायगर।
मैं तुम्हें यहाँ से दूर, हमारी महान राजधानी, दिल्ली के
किसी स्कूल का वज़ीफ़ा दिलाऊँगा।
-क्लैविकल? -क्लैविकल।
क्लैविकल?
अंधेरे में, हम सब एकसाथ सोया करते थे…
एक जीव, कनखजूरे की तरह एक-दूसरे के ऊपर टाँगे रखकर।
मगरमच्छ कैसे तैरते हैं?
सारस। वह हमारे गाँव पर राज करने वाला ज़मींदार था
और हमारी कमाई का एक-तिहाई हिस्सा वसूल किया करता था।
वह गाँव को इस तरह से निचोड़ लेता था कि बाद में कुछ नहीं बचता था।
हम उसके बड़े बेटे, नेवले से और ज़्यादा डरते थे।
और मेरे पिता हमेशा उनके कर्ज़दार रहते थे।
मुन्ना!
मैंने दोबारा कभी स्कूल में कदम नहीं रखा।
उस साल के अंत तक, मेरे पिता टीबी के चलते बीमार पड़ गए थे।
लक्ष्मणगढ़ में किसी नेता ने अस्पताल नहीं बनवाया था,
इसलिए दो दिन का सफ़र तय कर, दूसरे गाँव जाना पड़ा।
कोई डॉक्टर नहीं आया।
चुनाव के वादों से मैंने सीखा था
कि एक आज़ाद प्रजातंत्र में गरीब न होना कितना ज़रूरी होता है।
मरकर भी, वह अपनी किस्मत का विरोध कर रहे थे।
मरने, दोबारा जन्म लेने, और फिर से मर जाने का विरोध, सब बेकार में।
उस पल मैंने यह समझा
कि भारत में एक आदमी के लिए अपनी आज़ादी पाना कितना मुश्किल है।
बाद में, मुझे इसकी वजह समझ में आई।
दस हज़ार साल के इतिहास में,
इस देश में से जन्म लेने वाली सबसे महान चीज़ है, चाकरी का चरखा।
उन्हें खून दिखाई देता है, उसकी गंध भी आती है।
उन्हें पता है कि अगली बारी उनकी है, फिर भी बगावत नहीं करते।
वे पिंजरे से निकलने की कोशिश ही नहीं करते।
यहाँ के नौकरों को भी इसी तरह से पेश आना सिखाया गया है।
उसकी पीठ पर लदे सामान की कीमत उसकी दो साल की पगार जितनी है,
फिर भी, ईमानदारी से यह पैसा अपने मालिक तक पहुँचा देगा,
बिना उसमें से एक पैसा लिए।
कोई नौकर नहीं लेता।
क्यों? क्योंकि भारतीय लोग दुनिया में सबसे ईमानदार और धार्मिक होते हैं?
नहीं।
क्योंकि हम में से 99.9 प्रतिशत लोग चाकरी के चरखे में फँसे हैं।
नौकर इस हद तक वफ़ादार होते हैं
कि आप एक आदमी के हाथ में मोक्ष की चाबी पकड़ा सकते हैं
और वह श्राप देकर उसे दोबारा आपकी ओर फेंक देगा।
मैंने अपने समय में, चोरी से ग्राहकों की बातें सुनना सीखा था।
एक मौके की तलाश में।
यह करना मेरे भाई ने बहुत पहले छोड़ दिया था।
पता है कि आप जैसे साम्यवादी भगवान को नहीं मानते,
पर आप किस्मत को मानते हैं?
तभी मैंने पहली बार उन्हें देखा था, सारस के सबसे छोटे बेटे, अशोक साहब को।
वह हाल ही में अमरीका से भारत लौटकर आए थे, धनबाद में,
जहाँ उनके परिवार ने कोयले से दौलत कमाई की थी।
तभी मुझे समझ में आ गया कि यही मेरे मालिक हैं।
दादी ने उसकी शादी कर दी थी,
अपनी बीवी के साथ मौज-मस्ती के लिए दो हफ़्ते दिए थे,
और अब वह यहाँ फँसा बैठा था। मेरी भी वही हालत होती।
धनबाद
और अब, मुझे बस गाड़ी चलाना सीखना था।
उनका पता ढूँढना उतना मुश्किल नहीं था।
मुझे बस दरवाज़ा पार करना था।
चार साल से हम गाड़ी चला रहे थे। वहाँ मालिक गुज़र गए…
नमस्ते। आप ही के गाँव से हूँ, सर! लक्ष्मणगढ़ से।
मैं मुख्य जंक्शन पर चाय की दुकान पर काम करता था, सर!
मैं ही आपकी गाड़ी पर चाय लाता था।
कि गाँव पर राज करने के लिए, आपके और बेटे हों।
लोग अभी भी मुझे याद करते हैं?
हम सब कहते हैं कि हमारे पिता चले गए, सर।
सभी ज़मींदारों में सबसे अच्छे और नेक, गांधी जी की तरह।
गांधी की तरह?
-जी, सर। मोहनदास करमचंद गांधी जी। -अच्छा।
तुम्हें क्या चाहिए?
सर, आपकी इजाज़त हो तो,
आपके लिए ड्राइवर बनना चाहता हूँ। या आपके बेटे के लिए।
-तुम मुसलमान हो? -नहीं, सर।
हर रोज़ नहाता हूँ।
खुद को साफ़ रखता हूँ, और आलसी नहीं हूँ।
-हैलो, मेरा नाम अशोक है। -मत करो।
तुम्हें ड्राइवर चाहिए, यह हमें घुमाकर लाएगा।
-देखें कितना अच्छा है। -जी, सर।
मेरी किस्मत देखिए, नेवला।
-चला लेता है। -हाँ।
पुराने ज़माने में, जब भारत धरती पर सबसे अमीर देश था,
एक हज़ार जातियाँ और किस्मतें थीं।
इन दिनों, सिर्फ़ दो जातियाँ हैं।
बड़े पेट वाले मर्द और छोटे पेट वाले मर्द।
और बस दो ही किस्मतें हैं। शिकार करो या शिकार बन जाओ।
-हमारे सारे नौकर ऊँची जाति के हैं। -जाति से क्या फ़र्क पड़ता है?
-मेरी जाति में कभी नहीं पीते। -तो क्या करते हो?
इसलिए इतनी मीठी-मीठी बातें कर रहा है?
-खाना पकाते हो? -बिल्कुल, सर। बहुत अच्छा।
-क्या बनाते हो? -हर तरह की मिठाइयाँ, सर।
गुलाब जामुन, रसगुल्ला, लड्डू, रसमलाई, काजू बर्फ़ी।
ड्राइवर खाना भी पका लेता है। सिर्फ़ भारत में। कल से शुरू कर सकते हो?
इतनी जल्दी नहीं। पहले इसके परिवार का पता लगाना होगा।
आप लोग मेरे माँ-बाप जैसे हैं। माँ-बाप से पैसे कैसे माँगूँ?
महीने के पंद्रह सौ।
नहीं, सर, बहुत ज़्यादा हो जाएगा। मुझे उसका आधा दे दीजिए, सर। बहुत है।
तुम्हें दो महीने से ज़्यादा रखा, तो दो हज़ार हो जाएगी।
-सिर्फ़ मेरे लिए गाड़ी चलाओगे। -जी, सर।
इतना हॉर्न मत बजाओ।
तुमने ऐसा क्यों किया?
सलाख निकालें?
-ऐसा मत करो। -सलाख निकालते हैं।
नेवले ने लक्ष्मणगढ़ में अपने आदमी को फ़ोन किया होगा,
क्योंकि दो दिन बाद, जब उन्होंने मुझे काम पर रखा,
मेरे परिवार के बारे में सब पता था।
हमारे देश की आन-बान-शान, भारतीय परिवार।
हर मालिक को हर समय पता होना चाहिए कि उसके नौकर का परिवार कहाँ रहता है,
अगर नौकर अपने मालिक से चोरी करके भागने का फ़ैसला करे तो।
अगर ऐसा होता है…
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