The first 184 lines.
प्रस्तुत फ़िल्म पद्मावत मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा लिखे गए
महाकाव्य पद्मावत से प्रेरित है जिसे प्रचलित रूप से काल्पनिक माना जाता है।
फ़िल्म में दर्शाए गए सभी स्थल, किरदार, घटनाएँ,
जगह, भाषाएँ, नृत्य, पहनावे, इत्यादी
ऐतिहासिक रूप से सटीक या वास्तविक होने का कोई दावा नहीं करते।
हम किसी भी सूरत में
किसी भी इंसान, समुदाय, समाज,
उनकी संस्कृति, रीति-रिवाजों, उनकी मान्यताओं,
परम्पराओं, या उनकी भावनाओं को
हानि पहुँचाना या
उनकी उपेक्षा करना नहीं चाहते।
इस फ़िल्म का उद्देश्य सती
या ऐसी किसी भी प्रथा को बढ़ावा देना नहीं है।
पद्मावत
अफ़गानिस्तान, 13वीं शताब्दी
ये देखिए खिलजियों के सरदार।
समझ नहीं आता,
ये दिल्ली से गज़नी क्या सिर्फ़
खाने और सोने के लिए आए हैं।
शरीफ़ पाशा, ये हमें लेने आए हैं।
इनका इरादा है
कि हम सब मिलकर दिल्ली सल्तनत पर हमला कर दें।
या ख़ुदा, तो अब सरदार दिल्ली के सुल्तान बनना चाहते हैं।
सल्तनत से बग़ावत करेंगे।
बग़ावत नहीं।
सारा मसला ख़्वाहिशों का है।
जी।
कब तक हम सल्तनत की ख़िदमत करते रहें? कब तक, हाँ?
अब हम तो सल्तनत का तख़्त चाहते हैं।
वल्लाह!
कौन है ये गुस्ताख़?
- -
वाह!
वल्लाह!
अलाउद्दीन, ये...
क्या उठा कर ले आए?
चाचाजान,
आप ही ने तो कहा था लाने?
अब हम पर ये वक़्त आ गया है कि हम इनसे शुतुरमुर्ग लाने की फ़रमाइश करेंगे?
हमें कुछ याद नहीं है।
लेकिन अलाउद्दीन कुछ नहीं भूलता।
चाचाजान, हम आपकी इतनी इज्ज़त करते हैं, आपने एक पर मांगा,
हम पूरा शुतुरमुर्ग ले आए।
पर?
हाँ, याद आया।
शहज़ादी मेहरु के लिए।
ओह! मेहरु के लिए।
मेहरु बेटे!
मेहरु! बेटे!
मेहरु बेटे!
जी, अब्बूजान।
देखो, हमने तुम्हारे लिए तोहफ़े में क्या मंगवाया है।
अल्लाह! शुतुरमुर्ग!
हमारी जान आप पर क़ुर्बान, अब्बूजान।
हमारी भी।
तुमने हमारी बेटी की
ख़्वाहिश पूरी की है।
इसके एवज में हम तुम्हें इनाम देना चाहेंगे।
क्या चाहिए? बोलो।
आपकी ख़्वाहिश पूरी करने के लिए हमने अपनी जान ख़तरे में डाल दी।
अब हमें आपकी जान चाहिए।
नहीं...
आपकी शहज़ादी मेहरुनिसा से हमारा निकाह।
बड़ा शातिर है।
एक नायाब चीज़ देकर,
दूसरी मांग रहा है। हम्म?
अल्लाह की बनाई हर नायाब चीज़ पर सिर्फ़
अलाउद्दीन का हक़ है।
कौन कहता है?
अलाउद्दीन।
मेहरुनिसा, बिंते जलालुद्दीन खिलजी,
क्या तुम्हें अलाउद्दीन खिलजी के साथ निकाह कुबूल है?
कुबूल है।
शरीफ़ पाशा,
हमारे दामाद इस महफ़िल से ग़ैरमौजूद क्यों हैं?
उनसे कहिए हमने तलब किया है।
जी। अभी बुलाते हैं।
अलाउद्दीन।
अलाउद्दीन।
अलाउद्दीन, आज तो तुम्हारे निकाह की रात है।
कम से कम, आज तो अपने आप को रोक ले।
सरदार को पता चलेगा
तो तेरा सिर काट के रख देगा।
बताएगा कौन?
तुम?
तुम नहीं बताओगे, शरीफ़ पाशा। तुम तो हमारे बचपन के यार हो।
हमारी जान हो।
तुम कभी नहीं बताओगे।
कभी नहीं।
कभी नहीं।
अल्लाह!
उस रात अलाउद्दीन का
वहशीपन देख दोनों काँप उठे थे,
धरती पर मेहरुनिसा
और आसमान में चाँद।
हर नायाब चीज़ पर हक़ रखने वाला अलाउद्दीन
बेख़बर था कि वहाँ से हजारों मील दूर
समंदर के उस पार
इस दुनिया की सबसे नायाब ख़ूबसूरती थी,
सिंघल की राजकुमारी।
तीर सही निशाने पर लगा आपका।
कोई है?
कोई है?
वर्धन।
आप सब यहाँ इस समय? बात क्या है?
आज ही महल में मेहमान आए थे,
मेवाड़ के रावल रतन सिंह जी।
आते ही शिकार पर निकल गए।
फिर वापिस महल नहीं लौटे।
महाराज ने उन्हें ढूँढ़ने का आदेश दिया है।
महाराज से कहना वो सुरक्षित हैं।
गुफ़ा में विश्राम कर रहे हैं।
जी।
चलो!
उन मोतियों का मोल जानते हैं आप?
इतने ही ख़ुश हो गए थे तो दो-चार गाँव लिख देते।
वो हार देने की क्या ज़रूरत थी?
कहना क्या चाहती हैं आप?
यही कि हमें वो हार वापिस चाहिए।
ब्याह में दामाद का मान समझकर आपको भेंट किया था और आपने...
उसे इस तरह लुटा दिया।
आप चिंता ना करे, हम वैसा ही हार बनवा देंगे आपके लिए।
तो क्या आप समुंदर पार जाएंगे वो मोती लाने?
सिंघल के मोती थे वो।
अब ना कभी वैसे मोती आएंगे,
ना वैसा हार बनेगा।
क्षमा मांगने आई हैं?
कमाल की शिकारी हैं आप।
हिरण की जगह
इस शिकारी को ही घायल कर दिया आपने।
पहले तीर से घायल किया और अब तेवर से।
माना कि वो हादसा था पर,
कुछ हादसे बहुत ख़ूबसूरत होते हैं,
आपके सिंघल की तरह।
जहाँ देखो वहाँ आँखें अटक जाती है।
वैसे हम इतनी देर से बातें कर रहे हैं पर
हम आपके बारे में कुछ नहीं जानते,
आप हमारे बारे में कुछ नहीं जानतीं।
मेवाड़ के महारावल रतन सिंह।
कैसे जाना आपने?
हमारे मेहमान जो हैं।
अच्छा स्वागत किया आपने अपने मेहमान का।
मेवाड़ छोड़कर सिंघल में क्यों?
मोती ख़रीदने।
यहाँ मोती बिकते नहीं।
किस्मत से मिलते हैं।
जैसे आप मिल गईं।
कुछ बताइए अपने बारे में।
कौन हैं आप?
क्या नाम है आपका?
यहाँ का पत्ता-पत्ता हमारा नाम जानता है।
पूछ लेना।
सिंघल की राजकुमारी है वो।
पद्मावती।
पिछले दो दिन से आपकी सेवा कर रही हैं।
पद्मावती।
क्षमा मांगते हैं, रतन सिंह जी।
सिंघल में आपका ठीक से स्वागत तो कर नहीं पाए।
और आते ही पद्मावती ने आपको घायल कर दिया।
बहुत बड़ी भूल हो गई हमारी बेटी से।
भूल हमारी थी, गंधर्वसेन जी, पद्मावती की नहीं।
शिकार करते हुए हमारी नज़र उन पर पड़ी।
हम ही दबे पाँव उनके पीछे-पीछे गए और
तीर भी हमें ही लग गया।
चलिए, हम आपको लेने आए हैं।
वापस महल में पधारें।
महलों में तो बहुत रह लिए।
यहाँ की सादगी हमें बहुत अच्छी लग रही है।
अगर आपको बुरा न लगे तो हम कुछ दिन यहीं रहना चाहेंगे।
रतन सिंह जी,
मेहमान बनकर आप आए थे यहाँ,
अब लगने लगा है
हमारे परिवार का हिस्सा हैं।
हम चाहते हैं कि आप सिंघल से
मोती लेकर जाएँ, घाव नहीं।
सिंघल के मोती।
वैसे ही हैं जैसे आप ढूंढ़ रहे थे।
क्या सोच रहे हैं?
मोती मिल गए तो आप वापस मेवाड़ चले जाओगे ना?
हमारे जाने का वक़्त आ गया है।
कैसे जाओगे?
घाव जो नहीं भरा।
हमारे साथ मेवाड़ चलेंगी, पद्मावती?
हमारी पत्नी बनकर।
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