The first 200 lines.
दारा, मलिक का फ़ोन आया था।
हमारे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है। मैं आ रहा हूँ।
बॉम्बे
दारा, जहाज रेडी है।
बब्बन भी एयरपोर्ट पहुँचता ही होगा।
हमें अभी दुबई के लिए निकलना चाहिए।
अब्बू नहीं मान रहे।
जिसको जाने का है, चले जाओ।
उसके गुनाहों की सज़ा मैं नहीं भुगतूँगा।
वक़्त कम है अब्बू। वहाँ जाके झगड़ा कर लेंगे।
-इस्माइल-- -मैं नहीं जाऊँगा, सकीना।
समझाओ इनको, मर जाएँगे इधर।
तेरे साथ जीने से बेहतर है।
अब्बू, बहुत हो गया है!
-इस्माइल! -इस्माइल भाई!
सकीना, समझाओ इसको। ज़िद नहीं करने का।
इस्माइल!
वर्ना एक और लाश पीछे छोड़ के जाएगा ये।
कायनात का निज़ाम है,
बुराई भी अच्छाई से पैदा होती है।
शैतान को भी अल्लाह ने ही पैदा किया था।
मैं तो सिर्फ एक बाप था।
बंबई मेरी जान
बॉम्बे
कादरी साहब!
माफ़ी, देरी हो गई।
कोई बात नहीं। आप आ गए, यही बहुत है।
अरे आना तो था ही मुझे।
-आइए, आइए। -नहीं, नहीं, आप--
-बेटे की शादी बहुत-बहुत मुबारक हो आपको! -जी,जी।
-आप-- -आप मेहमानों को संभालिए ना!
मैं कर लूँगा। आप जाइए।
- इस्माइल भाई, सलाम वालेकुम! -सलाम भाई!
-वालेकुम असलाम। -सलाम वालेकुम।
वालेकुम… असलाम!
कहाँ से तीर मार के आ रहे हैं आज आप?
अबे तीर नहीं, घर से झाड़ू मार के आया होगा।
तुम लोगों को बड़ी जल्दी थी दावत पे आने की, भुक्कड़ लोग!
कुछ छोड़ा है कि नहीं मेरे लिए?
-बहुत है, महाराज। -तुम्हारे लिए ही रुके हैं, खाने के लिए।
-ऐसा है, मैं तो बहुत खुश हूँ आज। -क्यों?
सकीना खुश है। देख।
अपनी जान बच गई।
अरे, ये वाला लात ही नहीं मार रहा है।
देखना लड़की होगी इसीलिए।
तुम्हारे मुँह में घी शक्कर! ऐसा हुआ ना,
-मैं तो अफलातून खिलाने वाली हूँ। -अच्छा?
-सच्ची। -सलाम वालेकुम।
-वालेकुम असलाम। -अरे, वालेकुम असलाम, भाभी।
-भाभी! -कैसे हैं आप?
नज़मा कितनी खूबसूरत लग रही है।
अरे? ये पानी कहाँ से गिर रहा है?
बिन मौसम बरसात?
अरे, वो देख।
क्या चल रहा है?
ए! क्या कर रही है इधर?
-चिल्ला क्यों रहा है? -ये छोकरे लोगों का एरिया है।
-भाग इधर से, नहीं तो-- -नहीं तो?
मैं डरती नहीं हूँ तेरे से।
परी?
कहाँ है तू?
-परी? -उधर भाग, उधर।
कहाँ गायब हो जाती है?
यहाँ क्या कर रही है बेटा तू?
चल अब।
मैंने कितनी बार कहा है,
कहीं मत जाना।
फिर भी सुनती नहीं है।
-सलाम! -हाजी साहब।
-सलाम वालेकुम, हाजी! -सलाम वालेकुम, हाजी साहब।
सलाम वालेकुम, पठान।
सलाम वालेकुम।
-मुबारक हो! -जी शुक्रिया।
आइए।
आदाब।
-हाजी साहब। -शादी मुबारक!
बहुत-बहुत मुबारक हो!
इन लोगों को यहाँ किसने बुलाया?
हाँ!
ये क्या कर रही हो, आपा?
भाईजान, तुम क्या कर रहे हो?
मुझे दावत में बुलाया इन चोर-उचक्कों के साथ बैठने के लिए। हाँ?
मेरा बेटा नशा कर-कर के मर गया।
तुम लोगों के यहाँ जाता था वो नशा करने को।
मेरे बेटे के खूनी को आप इतनी इज़्ज़त दे रहे हैं, भाईजान?
क्यों?
अल्लाह को क्या मुँह दिखाओगे आप?
इन लोगों की इज़्ज़त मत करो।
इनसे मत डरो आप!
मेरा बच्चा…
सुलेमान मकबूल!
हैदराबाद से आया था कुली बनके।
उसने यहाँ के कुलियों को ख्वाब दिखाया।
और उनके साथ माल चुराना शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे सब कुली उसके लिए काम करना शुरू कर दिए।
अब वो सोना चुराते, इलेक्ट्रॉनिक्स उठाते,
और जो भी चीज़ बिक पाती वो बेच देते थे।
फिर सुलेमान मकबूल उन पैसों से हज पे गया।
और सुलेमान से बना… हाजी साहब!
बंबई का बादशाह!
-चीयर्स! -चीयर्स!
कहते हैं कि हज पे सारे गुनाह माफ़ हो जाते हैं।
तो अब, हाजी साहब का धंधा स्मगलिंग नहीं इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट कहलाने लगा।
लोगों का डर इज़्ज़त कहलाने लगा।
और हराम का पैसा, दौलत।
हाजी शौकीन मिजाज का था।
उसकी दावत पे सब आते थे। आना पड़ता था।
शामें रंगीन करने के लिए फ़िल्मी हिरोइन से लेकर
बड़े-बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट और ऊँचे ओहदे के ऑफिसर
सब अपनी हाज़िरी देने आते थे।
बाहर जश्न हो रहा होता
और बंद कमरों में बिज़नेस।
देखिए, हमारी डील के मुताबिक सारी पेमेंट हो चुकी है।
-जी। -लेकिन एक प्रॉपर्टी का मालिक है
जो अब भी फसाद खड़ा कर रहा है।
-आपने वादा किया था कि आप-- -नहीं-नहीं। मैंने आपसे वादा नहीं किया था।
मैंने आपको ज़ुबान दी थी।
और मैं अपनी ज़ुबान कटने नहीं दूँगा, भंडारी साहब।
बंबई में खौफ़ का नाम था, अज़ीम पठान।
अफ़ग़ानिस्तान से फरार होकर बंबई आया था।
हाजी की अक्ल और पठान की ताकत मिलकर
बंबई पर राज कर रही थी।
वो सारे ऐसे धंधे जिसमें हाजी अपनी आस्तीन काली नहीं करना चाहता था, पठान संभालता था।
चरस, अफ़ीम, जुआ, किडनैपिंग, सुपारी, जमींदारी।
हर गुनाह के दरवाज़े पर पठान का नाम था।
सलाम वालेकुम, मियाँ!
- दहशत उसका कारोबार था। -सलाम, पठान।
पठान, ये क्या बात है, हाँ?
तू… तू मेरे को यहाँ पे क्यों लेकर आया है?
देख, मैं बोल रहा हूँ। मैं तुम लोगों से डरता नहीं हूँ।
तेरे को समझ नहीं आ रहा है क्या? मैं बोल रहा हूँ, मैं इस पेपर पर साइन नहीं करूँगा--
हाजी को बोलो काम हो गया है।
उसी वक़्त मैं रत्नागिरी से नया-नया जज़्बा लेकर आया था।
पुलिस में भर्ती होकर
इन सारे शैतानों को कैद करना चाहता था।
अब पता नहीं ये मेरी बहादुरी थी या बेवकूफ़ी।
ए, सेठ कहाँ है तेरा?
सेठ कहाँ है?
बता कहाँ है सेठ?
सेठ कहाँ है तेरा?
-ए अहमद! -हाँ?
ज़ब्त कर दारू-वारू सब।
हाँ, लेके जा इसको अंदर।
चलो सब अंदर। नाम लिख, इसपे नाम लिख।
ओह तेरी, शैतान के पिल्लों की पार्टी!
इस्माइल, तू?
भेनचोद, यहाँ क्या कर रहा है बे?
जुआ खेलने आया था। जैकपॉट लग गया।
औकात में रह, इस्माइल।
ज़्यादा श्याणा मत बन। समझा?
चल निकल।
इस्माइल।
-और नहीं रहा तो? -इस्माइल?
क्या कर लेगा तू?
थाने लेजा के समझाऊँ?
वही तो मैं बोल रहा हूँ!
चल ना थाने।
भेनचोद! मादरचोद!
वर्दी को हाथ लगाता है साले!
-वर्दी के लायक नहीं है तू। -तेरे को मालूम है?
साले, तेरी वर्दी मैं उतरवाऊँगा।
अच्छा।
वो तीनों सीनियर ऑफिसर हैं, इस्माइल।
पठान के वहाँ मिले थे, साहब।
अरे, जाना पड़ता है।
वर्ना वो लोग बीवी बच्चों पर गोली चला देते हैं।
वैसे भी, कुछ लोगों को ज़िंदा रहना है, इस्माइल।
मजबूरी भी कोई चीज़ होती है।
वो लोग मजबूर नहीं लग रहे थे, साहब।
मजबूर लगता नहीं है कोई।
तुम माफ़ीनामा लिखो।
और रिलीज़ करो उन लोगों को। प्रेस को मैं देख लूँगा।
ठीक है?
लेकिन, साहब…
ये मेरा ऑर्डर है!
जाओ! चलो।
जो चाहे वो कर लो, कुछ नहीं होने वाला।
- सादिक़, आजा। -सारा शहर उनकी जेब में है।
यहाँ तक कि थाना भी।
मैं तो नहीं हूँ उनकी जेब में।
तुम लोग नहीं हो।
अरे दारा, जल्दी आ।
भैया, बना दीजिए। एक तो पहले बनाओ।
दारा।
-चल। -चलो-चलो।
अरे, मैं पहले लूँगा।
इस्माइल भाई, अपना भी तो परिवार है।
अगर अपने को कुछ हो गया तो, इनका ख्याल कौन रखेगा फिर?
हम लोग ऐसे हाथ पे हाथ रख के ना बैठ नहीं सकते।
हाँ, तो क्या कर लोगे यार?
कुछ करना पड़ेगा, अहमद।
कुछ करना पड़ेगा।
नई दिल्ली
बहुत प्रेशर है मेरे ऊपर, अरविन्द।
बॉम्बे सरकार के हाथ से निकल के…
हाजी और पठान के हाथ में जा रहा है।
क्या सिस्टम ने उन दोनों के सामने घुटने टेक दिए, अरविन्द?
नहीं, सर।
लेकिन हमारे हाथ बँधे हैं, सर।
तो उन्हें खोल देते हैं।
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